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दुनिया

भारत में डेंगू के सालाना 60 लाख मामले

कई सरकारी अभियानों के बावजूद देश में डेंगू के मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं. चिंता की बात यह है कि इन्हें दर्ज भी नहीं किया जा रहा है.

भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि देश में सालाना औसतन करीब 20,000 लोग डेंगू का शिकार होते हैं. लेकिन अमेरिका में हुए एक ताजा शोध की मानें तो असल संख्या इस से 300 गुना ज्यादा है. अमेरिकन जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन में छपी इस रिपोर्ट में साल 2006 से 2012 के बीच आंकड़ों पर ध्यान दिया गया है.

इस शोध को अमेरिका और भारत के रिसर्चरों ने मिल कर अंजाम दिया है. शोध से जुड़े एनके अरोड़ा ने इस बारे में बताया कि देश में मामलों के रिपोर्ट ना किए जाने की मुख्य वजह यह है कि प्राइवेट क्लीनिक और अस्पतालों से डाटा नहीं मिलता है और अधिकतर लोग इलाज के लिए वहीं जाते हैं. वहीं मेडिकल रिसर्च काउंसिल के बाल किशोर त्यागी ने कहा, "डेंगू के स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर असर को पूरी तरह समझना होगा ताकि नीति निर्माता और स्वास्थ्य अधिकारी भविष्य में होने वाले मामलों को रोक सकें." शोध करने वाले डॉनल्ड शेफर्ड का कहना है, "हमारी रिपोर्ट बताती है कि नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के तहत केवल 0.35 फीसदी मामले दर्ज हो पाते हैं."

डेंगू किसी विशेष देश से जुड़ी बीमारी नहीं है. हर साल यह दुनिया भर में चालीस करोड़ लोगों को अपनी चपेट में लेती है. मलेरिया की तरह यह भी मच्छर के काटने से फैलती है. लेकिन मलेरिया के विपरीत डेंगू का मच्छर दिन में काटता है और साफ पानी पर पनपता है.

डेंगू से बचाने के लिए ना ही कोई दवा मौजूद है और ना ही टीका. मच्छरों से खुद को बचाना ही एक विकल्प है. इस बीच ब्राजील में डेंगू फैलाने वाले मच्छरों को प्रतिरोधक बनाया जा रहा है. प्रयोगशाला में करीब दस हजार मच्छरों के साथ ऐसा किया गया है और उन्हें दोबारा रिहायशी इलाकों में छोड़ा गया है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वे डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के साथ प्रजनन करेंगे जिससे उनकी अगली पीढ़ी डेंगू फैलाने में नाकाम रहेगी. यह तरीका विएतनाम, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भी अपनाया जा चुका है.

आईबी/एएम (डीपीए, एएफपी)


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