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जर्मन चुनाव

भारत में जजों की जांच का रास्ता तैयार

भारत में न्यायपालिका पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. इससे निपटने के लिए सरकार ने जजों को जांच के दायरे में लाने के लिए कमर कस ली है. इससे जुड़े कानून के मसौदे को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी.

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सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से न्यायपालिका के दामन पर लगे दाग को साफ करने के लिए कानून बनाया जा रहा है. फिलहाल केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस कानून के मसौदे को मंजूरी दे दी है. न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक 2010 को कानून में तब्दील करने के लिए अब संसद में पेश किया जाएगा.

जस्टिस दिनाकरण मामले के बाद से सरकार इस तरह के कानून की जरूरत पर जोर दे रही थी. भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज किसी जांच एजेंसी के दायरे से बाहर हैं. इस तरह के मामलों में न्यायपालिका अपने स्तर पर ही जांच करती है. भ्रष्टाचार और कदाचार के दोषी जजों को पद से हटाने की प्रक्रिया काफी जटिल है और इसे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के पनपने का कारण माना जा रहा है.

Ambika Soni

विधेयक में कदाचार के दोषी जजों के खिलाफ जांच करने और दोषी पाए जाने पर पद से हटाने जैसे सख्त प्रावधानों को शामिल किया गया है. इसके कानून में बदलने पर जजों को अपनी और अपने परिवार वालों की संपत्ति और देनदारियां उजागर करनी होगी. इसे अदालत की वेबसाइट पर चस्पा भी किया जाएगा.

मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के बाद केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बताया कि यह कानून न्यायपालिका में पहले से भी ज्यादा जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा. यह विधेयक 1968 के मौजूदा कानून जजिस इंक्वायरी एक्ट को नया स्वरूप देगा. इसके तहत आम आदमी भी किसी जज के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकेगा.

किसी जज के खिलाफ पुख्ता सबूत मिलने पर एक समिति इसकी जांच करेगी. समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज करेंगे. वहीं सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के दो दो जज इसके सदस्य होंगे. दोषी पाए जाने पर समिति जज को चेतावनी जारी कर सकती है या जांच के दौरान ही इस्तीफा देने को भी कह सकती है.

रिपोर्टः एजेंसियां/निर्मल

संपादनः ए कुमार

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