भारत में घट रही है दानियों की तादाद | दुनिया | DW | 23.03.2013
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दुनिया

भारत में घट रही है दानियों की तादाद

दूसरों की मदद और दान की परंपरा वाले देश भारत में पश्चिमी देशों के मुकाबले कम दान होता है. पश्चिमी देशों के विपरीत भारत के रईस दान करने में पीछे हैं और सिर्फ मकसद पूरा करने के लिए दान करते हैं.

ग्लोबल कंसल्टेंसी बेन एंड कंपनी की रिपोर्ट के अनुसार गगनचुंबी इमारतें खड़ी करने वाले, अपने निजी जेट में उड़ान भरने वाले और विदेश जाकर शादियों का भव्य आयोजन करने वाले रईस भारतीय दान के लिए अपना बटुआ खोलते नहीं दिखते हैं. कंसल्टेंसी कंपनी के अनुसार भारत में पचपन अरब डॉलर की हैसियत वाले रईस लोग रहते हैं यानि ताजा रैंकिंग में भारत विश्व के रईसों में पांचवें स्थान पर है. फिर भी दुनिया भर में गरीबों की मदद के लिए हो रहे कुल दान में भारत का योगदान सिर्फ 3.1 फीसदी ही है जबकि अमेरिका में यह औसत 9.1 फीसदी है. जानकारों का मानना है कि जिस रफ्तार से भारत में लोगों की जेबें भर रही हैं उस अनुपात में जेब से दूसरों की मदद के लिए कम ही निकलता है.

दान से आत्म निर्भरता से दूरी

आम तौर पर भारत के रईस दान पर कुछ बोलते नहीं, लेकिन ऐसा लगता है कि दान न देना उनकी सोची विचारी नीति है. भारत के सबसे समृद्ध उद्योगपति मुकेश अंबानी ने अपने रहने के लिए सत्ताइस माला इमारत बनवाई है. हाल ही में उन्होंने पश्चिमी कॉर्पोरेट चैरिटी की आलोचना करते हुए कहा था कि इससे वे समाज को दूसरों पर निर्भर बना रहे हैं.

आर्थिक और सामाजिक मामलों के जानकार परनजॉय गुहा ठाकुरता भी इस बात से सहमत हैं. उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, "एक पुरानी कहावत है कि अगर कोई व्यक्ति भूखा है तो आप एक बार तो उसे मछली खिलाकर पेट भर सकते हैं लेकिन जब तक आप उसे खुद मछली पकड़ना नहीं सिखाएंगे वह आगे भी आपके पास मदद के लिए आता रहेगा. जरूरी बात यह है गरीबों की मदद करनी है तो उनका सशक्तिकरण करके की जाए. उन्हें निर्भर बना कर आप उनका कुछ भला नहीं कर रहे हैं."

आर्थिक खाई की वजह

इसके विपरीत मुंबई में शोध संस्था गेटवे हाउस की उपनिदेशक मंजीत कृपलानी का मानना है कि खासकर नए रईसों में देने की प्रवृत्ति कम देखने को मिल रही है. इसमें वृद्धि के लिए कॉर्पोरेट जगत को खुद आगे आकर कोई रास्ता निकालना होगा. जहां एक ओर गरीबी का संकट भारत के कई प्रांतों से अब तक हट नहीं पाया है वहीं नए कारोबारियों ने पिछले एक दशक में काफी तरक्की की है. ऐसे में समाज में आर्थिक खाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है. बेन कंपनी के लिए भारत पर सालाना रिपोर्ट लिखने वाली अपर्णा शेठ कहती हैं, "दान में भावनाओं का बहुत बड़ा हाथ होता है, जो कि इस समय कमजोर पड़ रहा है."

ताजा आंकड़ों के अनुसार दान करने वाले 146 देशों में भारत का 133वां स्थान है. जबकि 2011 में इसी सूची में भारत 91वें स्थान पर था. शेठ के साथ बेन की इस रिपोर्ट को लिखने वाले अनंत भगवती ने बताया कि लोगों का कहना है कि अगर उन्हें उनके दान से होने वाले सकारात्मक प्रभाव दिखाए जाएं तो शायद वे ज्यादा दान करें. बेन के इस सर्वे में पाया गया कि दान करने वालों में लगभग 70 फीसदी वे लोग हैं जो नए उद्योगपति हैं. यह एक अच्छा संकेत है.

भारत के बिल गेट्स टाटा और प्रेमजी

ठाकुरता ने डॉयचे वेले से कहा, "मुझे नहीं पता कि ये आंकड़े किस आधार पर निर्धारित किए गए हैं लेकिन मैं इनसे सहमत नहीं हूं. जब हम दान की बात करते हैं तो भारत के अजीम प्रेमजी और रतन टाटा के नाम क्यों भूल जाते हैं जो भारत के लिए बिल गेट्स जैसे हैं." गावों में आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य और शिक्षा की दिशा में इनका ट्रस्ट हर साल ढेरों रुपये दान करता है. विप्रो के मालिक अजीम प्रेमजी ने पिछले महीने 2.3 अरब डॉलर शिक्षा के क्षेत्र में खुद अपनी जेब से दान किए. फोर्ब्स मैगजीन ने उन्हें एशिया का सबसे बड़ा दानी कहा है. बिल गेट्स और वॉरेन बफेट द्वारा शुरू की गई 'गिविंग प्लेज' संस्था का मकसद था दुनिया के अमीर लोगों को इस बात के लिए तैयार करना कि वे अपनी कमाई का आधा हिस्सा लोगों की मदद के लिए दान करें. अजीम प्रेमजी इस क्लब में शामिल होने वाले पहले भारतीय हैं.

ठाकुरता मानते हैं कि भारत में दान करने के तरीके अलग हैं इसलिए कई बार वे नजर में नहीं आते. लोग अक्सर मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारों और गिरजाघरों में दान कर देते हैं. चर्चा तब होती है जब लोग किसी चैरिटी संस्था को पैसे देते हैं.

रिपोर्ट: समरा फातिमा (एएफपी)

संपादन: महेश झा

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