1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

भारत में गायब होते सिक्के

क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में बाजार से सिक्के तेजी से गायब क्यों हो रहे हैं? या यह कि सिक्कों की कमी और निकेल या गिलट जैसे धातुओं की कीमतों में उछाल का क्या संबंध है? इन दोनों का आपस में गहरा संबंध है.

देश के बाजारों में फिलहाल वर्ष 2010 से पहले बने तीस प्रतिशत सिक्के ही प्रचलन में हैं. वैसे सिक्के ताम्र-गिलट के बने होते थे. व्यापारी उन सिक्कों को गलाकर धातु निकाल लेते थे. यह महज संयोग नहीं है कि गिलट की कीमत वर्ष 2010 में साढ़े तीन सौ रुपए प्रति किलो थी जो अब लगभग तीन गुनी बढ़ कर एक हजार रुपए तक पहुंच गई है.

एक उदाहरण से सिक्कों के गायब होने का रहस्य आसानी से समझा जा सकता है. दो रुपए के एक सिक्के का वजन छह ग्राम होता है. ऐसे पांच सौ सिक्कों का अंकित मूल्य एक हजार रुपए होगा. लेकिन इन पांच सौ सिक्कों को गला कर तीन किलो गिलट हासिल किया जा सकता है. एक हजार रुपए प्रति किलो की दर से इसकी कीमत तीन हजार रुपए यानी सिक्कों के अंकित मूल्य से तीन गुनी हुई.

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट

भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी एक ताजा रिपोर्ट में बाजार से गायब होते सिक्कों पर चिंता जताई गई है. दरअसल इन सिक्कों में जो निकेल होता है उसकी कीमत सिक्के की कीमत से तीनगुनी होती है. इसलिए लोग इनको धातु बाजार में बेच रहे हैं. रिजर्ब बैंक की ओर से पिछले दो सालों में भारी तादाद में सिक्के जारी किए जाने के बावजूद भारतीय बाजारों में इसकी भारी कमी पैदा हो गई है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2011 में लगभग 11.12 लाख सिक्के प्रचलन में थे. लेकिन वर्ष 2012 में इनकी तादाद घट कर 7.8 लाख रह गई.

सिक्कों की रहस्यमय गुमशुदगी की जांच करने वाले रिजर्व बैंक अधिकारियों ने इसके दुरुपयोग की संभावना से इंकार नहीं किया है. बैंक के एक अधिकारी बताते हैं, "वर्ष 2009 तक बने दो रुपए के सिक्कों में ताम्र-गिलट होता था. धातु के व्यापारियों को इस धातु से सिक्कों की कीमत के मुकाबले तीनगुनी कीमत मिल जाती थी." चार साल पहले बने एक, दो और पांच रुपए के सिक्के मौजूदा सिक्कों के मुकाबले भारी होते थे.

अर्थशास्त्री भी सहमत

सिक्कों की गुमशुदगी के इस रहस्य से अर्थशास्त्री भी सहमत हैं. जाने-माने अर्थशास्त्री दीपंकर दासगुप्ता कहते हैं, "पूरे देश में सिक्कों की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है.

मुनाफाखोर व्यापारी इन सिक्कों को अवैध तरीके से जमा करते हैं. उसके बाद इनको गला कर मिलने वाली धातु को बाजार में बेच दिया जाता है." ईस्टर्न इंडिया मेटल एसोसिएशन के अध्यक्ष एन. केजरीवाल कहते हैं, "पिछले चार वर्षों में गिलट की कीमतें तीन गुनी बढ़ गई हैं. इसलिए खासकर वर्ष 2010 से पहले बने सिक्के बाजार से तेजी से गायब हो रहे हैं."

वह कहते हैं कि दो रुपए के पांच सौ सिक्कों को गला कर ही धातु के व्यापारी दो हजार रुपए मुनाफा कमा सकते हैं. उनका आरोप है कि बेईमान व्यापारी बड़े पैमाने पर यह खेल कर रहे हैं. इसी तरह, पांच रुपए के पुराने सिक्कों का वजन नौ ग्राम होता है. वैसे, दो सौ सिक्कों को गला कर धातु बाजार में 1800 रुपए कमाए जा सकते हैं. यानी आठ सौ रुपए का शुद्ध मुनाफा. लेकिन इन व्यापारियों के लिए दो रुपए के सिक्के को गलाना सबसे फायदे का सौदा है. यही वजह है कि दो रुपए के पुराने सिक्के बाजार से लगभग गायब हो गए हैं.

धातु विशेषज्ञों का कहना है कि गिलट का इस्तेमाल मुख्य रूप से ब्लेड उद्योग में किया जाता है. इसके अलावा बिजली संयंत्र, कंडेंसर पाइप और पेट्रोकेमिकल्स में भी इस धातु का इस्तेमाल होता है.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

DW.COM

संबंधित सामग्री