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दुनिया

भारत में आत्महत्या करते बच्चे

बाल सुधार की दिशा में उठाए गए उपायों और प्रगति के तमाम दावों के बावजूद भारत में 14 साल तक के उम्र के बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है. देश में रोजाना औसतन ऐसे आठ बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की ओर से जारी ताजा आंकड़ों से यह कड़वी हकीकत सामने आई है. विशेषज्ञों का कहना है कि सामाजिक माहौल में बदलाव, माता-पिता का रवैया और उम्मीदों का बढ़ता दबाव ही इसकी प्रमुख वजहें हैं. मध्य प्रदेश किशोरों की 349 आत्महत्याओं के साथ इस मामले में सबसे ऊपर है. उसके बाद तमिलनाडु (345) और पश्चिम बंगाल (298) का नंबर है. मध्य प्रदेश में हुई इन घटनाओं में 191 लड़के थे और 158 लड़कियां.

वर्ष 2012 में यह राज्य इस मामले में चौथे नंबर पर था. पिछले पांच वर्षों के दौरान यहां कुल 1830 बच्चों ने आत्महत्या कर ली. उनमें 972 लड़के थे. रिपोर्ट के मुताबिक, इस उम्र तक के बच्चों की ओर से आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं चेन्नई (45) में हुईं. उसके बाद दिल्ली (40), बेंगलुरू (36), भोपाल (27) और पश्चिम बंगाल के औद्योगिक शहर आसनसोल (25) रहे.

वजह

बच्चों में बढ़ती इस प्रवृत्ति की कई वजहें हैं. एक दशक पहले के मुकाबले मौजूदा दौर में बच्चे अपने आसपास के माहौल और हालात से जल्दी अवगत हो जाते हैं. अक्सर ज्यादातर बच्चे कम उम्र में इन हालातों से उपजे मानसिक दबाव को नहीं सह पाते. मनोवैज्ञानिक विनय मिश्र कहते हैं, "मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कम तादाद और स्कूली स्तर पर काउंसलरों की कोई व्यवस्था नहीं होने की वजह से बच्चों के पास अपनी भावनाएं व्यक्त करने के ज्यादा विकल्प नहीं होते. इसके अलावा कामकाजी अभिभावक बच्चों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते."

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परिवार का दबाव

विनय मिश्र कहते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में बच्चों में हताशा लगातार बढ़ती रहती है. कई बच्चे इससे निपटने में नाकाम होकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं. मध्य प्रदेश बाल अधिकार सुरक्षा आयोग की अध्यक्ष उषा चतुर्वेदी कहती हैं, "आयोग ने सरकार को कई बार निर्देश दिया है कि परीक्षा में नकल करते पकड़े जाने की स्थिति में बच्चों को सार्वजनिक तौर पर अपमानित या प्रताड़ित नहीं किया जाए." वह कहती हैं कि एकल परिवारों में बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिल पाती. ऐसे परिवारों को इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए.

एक गैर-सरकारी संगठन विकास संवाद की रोली शिवहरे कहती हैं कि बच्चों को स्थायी तौर पर तनाव की स्थिति में रखने के लिए मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के साथ माता-पिता भी जिम्मेदार हैं. अन्य मनोवैज्ञानिक डा. सोहिनी चटर्जी कहती हैं, "माता-पिता के पास बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान देने के लिए समय की कमी और लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव ही मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार हैं."

बंगलूरू मेडिकल कालेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर और मानसिक रोग विभाग के अध्यक्ष डा. एच. चंद्रशेखर कहते हैं, "कुछ माता-पिता अपने अधूरे सपनों को साकार करने का बोझ बच्चों पर थोप देते हैं. ऐसे में बच्चों पर शुरू से ही मानसिक दबाव बन जाता है. ऐसे दबाव उसे कामयाब नहीं होने देते. नाकामी की हालत में वह हताश होकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेता है."

उपाय

विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों पर बेवजह मानसिक बोझ थोपने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना जरूरी है. माता-पिता को भी अपने बच्चों पर ध्यान देना होगा. इसके अलावा स्कूलों में भी काउंसलरों की नियुक्ति अनिवार्य की जानी चाहिए. कर्नाटक केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर ए.एम.पठान कहते हैं, "माता-पिता को छोटी उम्र से ही बच्चों पर अपनी मर्जी थोपने की बजाय उनको अपना करियर चुनने की आजादी देनी चाहिए. इससे उन पर अनावश्यक दबाव नहीं पैदा होगा."

मुंबई स्थित चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर के निदेशक डा. समीर दलवई का कहना है, "हम अपने बच्चों को नाकामी का सामना करना नहीं सिखाते. इससे बच्चे सहज ही अपनी नाकामी नहीं पचा पाते." विशेषज्ञों की राय में बच्चों पर पढ़ाई या करियर को लेकर अभिभावकों या स्कूलों की ओर से अनावश्यक दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए. वैसी स्थिति में बच्चों में आत्महत्या की इस बढ़ती प्रवृत्ति पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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