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ब्लॉग

भारत भूटान का बदलता भरोसा

भारत भले ही सदिच्छा और सदाशयता दिखाने की कोशिश क्यों न करे, दक्षिण एशिया में उसकी छवि एक ऐसे दबंग पड़ोसी की बनती जा रही है जो सब पर अपनी धौंस जमाकर हावी रहना चाहता है.

पाकिस्तान के साथ तो उसके तनावपूर्ण रिश्तों का एक लंबा इतिहास है और यदि दोनों देशों की आपस में नहीं बनती तो उसके लिए भारत को अधिक दोषी नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन अन्य देशों के साथ भी उसके घनिष्ठ और प्रेमपूर्ण रिश्ते नहीं हैं, यह बेहद आश्चर्य की बात है. क्योंकि भारत एक बड़ा और शक्तिशाली देश है, इसलिए इन रिश्तों को सौहार्दपूर्ण बनाने की जिम्मेदारी भी उसकी अपेक्षाकृत अधिक है. लेकिन लगता है कि भारत का विदेश मंत्रालय चलाने वाले नौकरशाहों को अपने देश की गिरती साख और खराब होती छवि की कोई विशेष चिंता नहीं है. साथ ही यह भी स्पष्ट होता जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में राजनीतिक नेतृत्व नौकरशाही पर लगाम कसने में लगभग पूरी तरह विफल रहा है.

पूरे दक्षिण एशिया में भारत का भूटान से पक्का कोई और दोस्त नहीं. 2003 में शाही भूटान सेना ने भारतीय सेना के साथ मिलकर यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (अल्फा), नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) और कामतापुर लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (केएलओ) के खिलाफ सफल अभियान चला कर सिद्ध कर दिया कि दोस्ती कितनी पक्की है. 1949 में भारत और भूटान के बीच हुई मैत्री संधि में स्पष्ट रूप से कहा गया कि भारत भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा और भूटान विदेशी मामलों में भारत के मार्गदर्शन का लाभ उठाएगा. भूटान ने हमेशा अपनी विदेश नीति को भारतीय विदेश नीति के अनुरूप ही चलाया और कभी चीन का कार्ड खेलने यानी भारत की पीठ पीछे चीन के साथ घनिष्ठता बढ़ाने की कोशिश नहीं की. इसी का नतीजा था कि दोनों देशों के आपसी संबंधों में कभी खटास नहीं आई.

जब भूटान ने लोकतन्त्र के रास्ते पर कदम बढ़ाने का फैसला लिया, तो भारत ने 1949 की मैत्री संधि की समीक्षा करते समय उसमें से यह प्रावधान हटा दिया कि अन्य देशों के साथ संबंध कायम करते समय भूटान भारत से मार्गदर्शन लेगा. लेकिन भारत को यह उम्मीद जरूर रही कि भूटान अपनी विदेश नीति का संचालन करते समय भारतीय सरोकारों और चिंताओं को ध्यान में रखेगा और उसकी जानकारी के बिना कोई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाएगा.

लेकिन 2008 में जब जिगमी वाई थिनले देश के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने, उसके बाद से भूटान की नई सरकार का रुख बदलने लगा. पिछले साल जून में जब ब्राजील में थिनले और चीन के प्रधानमंत्री वेन चियाबाओ की भेंट हुई तो भारत सकते में आ गया क्योंकि उसे इसके बारे में कोई पूर्व जानकारी नहीं थी. जब भूटान सरकार की एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि इस भेंट के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भूटान की गैरस्थायी सदस्यता के बारे में चर्चा हुई और चीन सरकार की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि भूटान चीन के साथ शीघ्र से शीघ्र औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित करना चाहता है, तो भारत के कान खड़े हो गए.

नेपाल की तरह ही भूटान का भी 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार भारत के जरिये होता है क्योंकि दोनों पर्वतीय राष्ट्र हैं जिनके एक ओर भारत है और दूसरी ओर चीन. भारत द्वारा भूटान को सबसे अधिक आर्थिक सहायता दी जाती है, जिसमें मिट्टी के तेल और रसोई गैस पर सब्सिडी भी शामिल है. पिछली 12 जुलाई को भूटान में आम चुनाव हुए. इसके एक पखवाड़े पहले भारत ने इस सब्सिडी को वापस ले लिया जिसके कारण भूटान में चुनाव प्रक्रिया की बीच अचानक आर्थिक संकट पैदा हो गया. भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना था कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने उसकी जानकारी के बगैर सब्सिडी वापस लेने का पत्र जारी कर दिया, लेकिन उसके इस स्पष्टीकरण पर बहुत कम लोगों को यकीन है.

चुनाव प्रक्रिया के दौरान भारत के इस निर्णय का भूटान की विपक्षी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपने चुनाव प्रचार में भरपूर फायदा उठाया और मतदाताओं तक यह संदेश पहुंचाया कि यदि सत्तारूढ़ पार्टी डीपीटी को फिर से चुना गया, तो भारत के साथ भूटान के संबंध बिगड़ने का खतरा है और इसका सीधा सीधा अर्थ भूटानवासियों के लिए आर्थिक परेशानी होगा. जब चुनाव के नतीजे सामने आए तो 47 सदस्यों वाली निवर्तमान संसद में मात्र दो सदस्यों वाली पीडीपी ने 32 सीटों पर सफलता प्राप्त कर ली. भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तुरंत एक पत्र भेजकर पीडीपी के नेता और भावी प्रधानमंत्री शेरिंग टोब्गे को बधाई तो दी ही, साथ ही हर प्रकार के आर्थिक सहयोग का आश्वासन भी दिया. अब वह दिन दूर नहीं जब सब्सिडी फिर से बहाल हो जाएगी.

भारत के इस कदम की भारतीय मीडिया में भी खासी आलोचना हुई है क्योंकि इससे ऐसा संकेत मिलता है कि मैत्री संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करके भारत ने परोक्ष रूप से भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया है और एक पार्टी को जीतने में मदद की है. भूटान छोटा सा देश भले ही हो, वह एक प्रभुसत्ता सम्पन्न स्वाधीन देश है और भूटानवासियों को अपने राष्ट्रीय गौरव का गंभीरता से अहसास है. भारत को भूटान से जो भी शिकायतें रही हों, उसे चुनाव प्रक्रिया के दौरान सब्सिडी वापस लेने का कदम नहीं उठाना चाहिए था. और यदि यह मान भी लिया जाये कि विदेश मंत्रालय की जानकारी के बगैर पेट्रोलियम मंत्रालय ने यह कदम उठा लिया, तो इससे मनमोहन सिंह सरकार की छवि और भी धूमिल होती है क्योंकि इसका अर्थ है कि सरकार के बायें  हाथ को पता ही नहीं कि उसका दायां हाथ क्या कर रहा है. भारत और भूटान के बीच प्रगाढ़ मैत्री संबंध केवल भूटान के ही नहीं, भारत के हित में भी हैं.

ब्लॉगः कुलदीप कुमार

संपादनः अनवर जे अशरफ