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ताना बाना

भारत भी है बारूदी सुरंगों के खात्मे में रोड़ा

दुनिया के सबसे खतरनाक हथियारों में से एक लैंड माइन के इस्तेमाल पर रोक लगाने में सबसे बड़ा रोड़ा हैं भारत, पाकिस्तान और म्यांमार. दुनिया में इनका इस्तेमाल बंद है लेकिन ये तीनों देश लैंड माइन का उत्पादन कर रहे हैं.

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रूस ने हाल ही में कहा था कि उसने बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल बंद कर दिया है. इसके बाद इन पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने के काम में तेजी आई थी. लेकिन इस हथियार के खिलाफ काम करने वाले लोग मानते हैं कि भारत, पाकिस्तान और म्यांमार लैंड माइन को खत्म करने के मकसद में बड़ा रोड़ा हैं. इसके अलावा उत्तर कोरिया ही एक ऐसा देश है जहां की स्थिति का पता नहीं है. कुछ देशों में विद्रोही गुट भी इनका इस्तेमाल कर रहे हैं.

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बारूदी सुरंगों पर लिखी गई एक सालाना रिपोर्ट के संपादक मार्क हिजने ने बुधवार को पत्रकारों को बताया कि पिछले एक साल में दुनिया से बारूदी सुरंगों के खात्मे के काम में काफी तेजी आई है. उन्होंने कहा कि बारूदी सुरंगों के शिकार होने वाले लोगों की संख्या भी काफी कम हुई है जिससे पता चलता है कि 1997 की माइन बैन संधि काम कर रही है.

यह रिपोर्ट शांति के लिए नोबेल पुरस्कार जीत चुकी संस्था इंटरनेशनल कैंपेन टु बैन लैंडमाइंस (आईसीबीएल) ने जारी की है. रिपोर्ट के लिए शोध करने वाले स्टीव गूज कहते हैं कि इस हथियार के खिलाफ इस हद तक प्रचार किया गया है कि अब इसके खिलाफ जंग जीती जा चुकी है.

रिपोर्ट बताती है कि 156 देशों ने एक समझौते पर दस्तखत किए हैं. इस समझौते में बारूदी सुरंगों के उत्पादन, इस्तेमाल, परिवहन और संग्रहण पर प्रतिबंध लगाया गया है. लेकिन अब भी अमेरिका, चीन और रूस समेत दुनिया के 36 ताकतवर देश इस समझौते में शामिल होने को तैयार नहीं हैं. हालांकि वे समझौते के काफी प्रावधानों का पालन कर रहे हैं.

1999 से हर साल आ रही इस रिपोर्ट में हर बार रूस का नाम बारूदी सुरंगों को इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में होता था. लेकिन 2010 की रिपोर्ट में रूस का नाम उस सूची में शामिल नहीं है क्योंकि रूस ने एलान किया है कि अब उसने बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल बंद कर दिया है. अमेरिकी सेना भी इस बारे में अपनी नीति पर विचार कर रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल बारूदी सुरंगों की चपेट में आने से 3,956 लोगों की जान गई. हालांकि ये आंकड़े वही हैं जिनकी खबरें आती हैं. ऐसी बहुत सी घटनाएं दुनिया के कई इलाकों में हो रही हैं जिनका पता नहीं चल पाता.

रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार

संपादनः महेश झा

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