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ब्लॉग

भारत-पाक संबंधों में कदम-ताल

भारत के गृहमंत्री पाकिस्तान में गृहमंत्रियों के सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. कुलदीप कुमार बताते हैं कि पाकिस्तानी नेताओं की भारत यात्रा और भारतीय नेताओं की पाकिस्तान यात्रा में क्यों ढूंढे जाते हैं छुपे हुए निहितार्थ.

भारतीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की पाकिस्तान यात्रा का उद्देश्य पाकिस्तानी नेताओं के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर विचार-विमर्श करना नहीं बल्कि सार्क देशों के गृहमंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेना है. लेकिन पिछले कई दशकों से यह दस्तूर बन गया है कि पाकिस्तानी नेताओं की भारत यात्रा और भारतीय नेताओं की पाकिस्तान यात्रा में अनेक प्रकार के आशय, छुपे हुए उद्देश्य और निहितार्थ ढूंढे जाते हैं भले ही जाहिरा तौर पर इन यात्राओं का मकसद कुछ भी क्यों न हो. इसलिए राजनाथ सिंह की पाकिस्तान यात्रा का भी विश्लेषण किया जा रहा है जबकि अभी तक तो यही पता है कि वहां उनकी किसी पाकिस्तान के गृहमंत्री या किसी और अहम शख्सियत के साथ मुलाकात होना तय नहीं है.

कश्मीर का मुद्दा

यूं भी हाल ही में कश्मीर में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर और सामाजिक मीडिया पर लोकप्रिय युवा कमांडर बुरहान वानी की भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा हत्या किए जाने के बाद अचानक उभरे प्रतिरोध के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध एकाएक फिर से काफी खराब हो गए हैं. पाकिस्तान ने इस हत्या की निंदा की है और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने विश्वास जताया है कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा जरूर बनेगा. इसके जवाब में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि कयामत के दिन तक ऐसा नहीं हो सकता. स्वयं राजनाथ सिंह संसद में कश्मीर में स्थिति के बिगड़ने के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार बता चुके हैं. इसलिए इस तू-तू मैं-मैं के बीच उनकी पाकिस्तान यात्रा से कोई खास उम्मीद लगाना बेकार है.

एक नजर उन घटनाओं पर जिन्होंने दोनों देशों को बार बार बातचीत की मेज से युद्ध के उन्माद तक पहुंचाया.

अगर भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में होती और इन हालात में भारत के गृहमंत्री पाकिस्तान जा रहे होते, तो वह उनकी यात्रा की कड़ी आलोचना जरूर करती. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि औरों को भी ऐसा ही करना चाहिए. शत्रु देशों के बीच भी हर स्थिति में संवाद और संपर्क के रास्ते खुले रहते हैं. जिन दिनों शीत युद्ध अपने चरम पर था, उन दिनों भी सोवियत संघ और अमेरिका के बीच संवाद हमेशा जारी रहता था क्योंकि संवाद का कोई विकल्प नहीं है. प्रत्येक युद्ध का अंत वार्ता की मेज पर ही होता है.

अस्पष्ट पाकिस्तान नीति

राजनाथ सिंह की यात्रा का कुछ अतिरिक्त महत्व हो भी सकता था यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पाकिस्तानी के प्रति कोई स्पष्ट नीति बनाने में कामयाब हुई होती. लेकिन पिछली सरकारों की तरह मोदी सरकार भी तदर्थवाद की नीति पर चल रही है और कभी नरम-कभी गरम तेवर अपना रही है.

वायु सेना के पठानकोट-स्थित अड्डे पर आतंकवादी हमले के बाद उसने पाकिस्तानी जांच दल को वहां जाकर जांच करने तक की इजाजत दे दी लेकिन पाकिस्तान की ओर से कोई सहयोग नहीं मिला. अब नवाज शरीफ ने कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने का लक्ष्य एक बार फिर दुहरा कर बात फिर से वहीं पहुंचा दी है जहां से वह शुरू हुई थी. स्पष्ट है कि पाकिस्तान अपना यह लक्ष्य बातचीत के जरिये हासिल करने का सपना तो नहीं ही देख सकता. फिर क्या वह भारत से जंग करने की सोच रहा है, और क्या भारत इसके लिए तैयार है?

अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ क्रिस्टीन फेयर ने पाकिस्तानी सेना के अंदरूनी दस्तावेजों के आधार पर अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि पाकिस्तान को कश्मीर मिल भी जाए, तब भी भारत के साथ उसके रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते क्योंकि पाकिस्तानी सेना का अस्तित्व और पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान एवं समाज पर वर्चस्व केवल भारत-विरोध पर ही टिका हुआ है. इसलिए भारत के साथ सतत तनावपूर्ण संबंध बनाए रखना उसकी विवशता है.

हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी शिव सेना की पाकिस्तान विरोधी सोच का प्रभाव दोनों देशों के बीच खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों को प्रभावित करता रहा है. एक नजर पिछली कुछ घटनाओं पर.

यूं भी जब कभी पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार का शासन होता है, तब वहां स्पष्ट रूप से दो सत्ता केंद्र काम कर रहे होते हैं और इनमें भी सेना की ओर पलड़ा झुका हुआ होता है. भारत के साथ अगर कभी संबंध कुछ सुधरे भी हैं तो तभी जब पाकिस्तान में सत्ता सेना के हाथ में रही है.

ऐसे में राजनाथ सिंह की पाकिस्तान यात्रा का महत्व केवल इतना ही है कि हाल की कटुता के बावजूद दोनों देशों के बीच संवाद बना हुआ है और गृहमंत्री के ऊंचे स्तर पर भी जारी है. इस यात्रा को रूटीन यात्रा की तरह ही देखा जाना चाहिए.

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