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ब्लॉग

भारत चीनः असंतुलन कम करने की कवायद

17 सितंबर से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिन की भारत यात्रा पर आएंगे. उनकी इस यात्रा की शुरुआत अहमदाबाद से होगी. इस यात्रा को भारत में काफी उम्मीद से देखा जा रहा है. पढ़ें ब्लॉग

इस यात्रा का महत्व इस दृष्टि से और भी बढ़ गया है कि राष्ट्रपति शी चीन के सदाबहार दोस्त पाकिस्तान की वर्तमान राजनीतिक स्थिति और नवाज शरीफ सरकार के विरोध में हो रहे विरोध प्रदर्शन के कारण अपनी इस्लामाबाद यात्रा रद्द कर चुके हैं. भारत में इस यात्रा को बहुत उत्साह और उम्मीद के साथ देखा जा रहा है और सरकार की ओर से कई स्तरों पर इसका इजहार भी किया गया है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने तो दो दिन पहले बीजिंग में यह तक कह डाला कि चीन और भारत में राष्ट्रपति शी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे मजबूत शक्तिशाली, अत्यंत लोकप्रिय एवं निर्णय लेने में सक्षम नेता होने के कारण दोनों देशों के आपसी संबंधों के “कक्षा छलांगने” की संभावना उत्पन्न हो गई है. डोवाल ने यह भी कहा कि सीमा विवाद के सुलझने की संभावना भी पैदा हुई है, लेकिन वह सुलझेगा या नहीं यह किसी एक चीज पर निर्भर नहीं है.

भारत की वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारामन ने उम्मीद जताई कि चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान काफी बड़ी घोषणाएं होंगी. और कि दोनों देशों के बीच होने वाले व्यापार में असंतुलन को दूर करने की कोशिश की जाएगी. साथ ही सीतारामन ने उम्मीद जाहिर की कि चीन दूसरे देशों को निर्यात करने वाले उत्पाद भारत में बनाने के लिए यहां औद्योगिक इकाइयां लगाएगा एवं निवेश करेगा जिससे भारत में रोजगार पैदा हो सकेंगे. मई के अंत में वाणिज्य मंत्री का पदभार संभालने के बाद अब तक सीतारामन दो बार चीन की यात्रा कर चुकी हैं. उनकी इन यात्राओं के परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच जून में इस आशय के समझौते पर हस्ताक्षर भी किए गए कि चीन भारत में औद्योगिक पार्कों का निर्माण करेगा. चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है लेकिन जहां पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच 65.47 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, वहीं भारत का चीन को होने वाला निर्यात वहां से होने वाले आयात से 35 अरब डॉलर कम था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी हाल की जापान यात्रा के दौरान बिना किसी देश का नाम लिए 18वीं सदी में अपनाई गई विस्तारवादी नीतियों का जिक्र किया था और यह माना गया था कि उनका इशारा चीन की ओर था. चीन के सरकारी मीडिया में उनके बयान पर तीखी टिप्पणियां भी की गई थीं. लेकिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सोमवार को इस बात का खंडन किया और कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान बहुत अच्छा समीकरण बना है. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि चीन के प्रति भारत की नीति में कुछ बदलाव अवश्य आया है. स्वराज ने कहा कि भारत तिब्बत और ताइवान पर चीन की संवेदनाओं और सरोकारों को समझता है और उम्मीद करता है कि चीन भी अरुणाचल प्रदेश के बारे में भारत की संवेदनाओं को समझेगा. भारत यदि ‘एक चीन' की नीति पर चल रहा है तो चीन को भी ‘एक भारत' की नीति पर चलना होगा. उन्होंने यह भी कहा कि भारत और चीन के बीच सहयोग और स्पर्धा के संबंध हैं.

जहां तक स्पर्धा का सवाल है, भारत और चीन के बीच काफी बड़ा फासला आ चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत चीन के मुकाबले तीन दशक पीछे है. आर्थिक एवं सामरिक, दोनों दृष्टि से चीन भारत से मीलों आगे है. ऐसे में दोनों के हित में है कि सहयोग अधिक हो और स्पर्धा कम. सीमा विवाद पर दोनों देशों ने जैसा सकारात्मक रुख अपनाया है, भारत पाकिस्तान से उसी मॉडेल को अपनाने का आग्रह करता रहा है. वे सीमा विवाद को अन्य क्षेत्रों में आपसी संबंधों को बढ़ाने की राह में रोड़ा नहीं बनने देते. चीन आर्थिक संबंध बढ़ाने पर बहुत जोर देता है जो भारत के हित में भी है. सिर्फ उसे यह देखना है कि आर्थिक सहयोग का लाभ दोनों देशों को समान रूप से मिले और किसी एक देश के पक्ष में असंतुलन पैदा न हो.

राष्ट्रपति बनने के बाद शी जिनपिंग की यह पहली भारत यात्रा है और इसलिए इसका प्रतीकों और संकेतों की भाषा में राजनय करने वाले चीन के लिए बहुत प्रतीकात्मक महत्व है. उन्होंने स्वयं इस बात की सराहना की है कि उनकी यात्रा की तैयारी के लिए भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल को बीजिंग भेजा. स्पष्ट है कि शी और मोदी, दोनों ही इस यात्रा को अधिक से अधिक सफल बनाने में गहरी रुचि ले रहे हैं. इसलिए यह मानना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के परिणामस्वरूप भारत-चीन संबंधों को एक नई ऊंचाई मिल सकती है.

ब्लॉगः कुलदीप कुमार

संपादनः आभा मोंढे

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