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दुनिया

'भारत को बेहतर जजों की जरूरत'

दिल्ली बलात्कार मामले में अदालत ने चारों आरोपियों को दोषी तो घोषित कर दिया है, लेकिन यह काफी नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह का कहना है कि कानून में बदलाव की जरूरत है.

डीडब्ल्यू: बलात्कार के इस मामले को भारत में बीते दिनों की सबसे क्रूर घटना के तौर पर देखा जा रहा है. इससे भारत में बहस छिड़ गई. आपको क्या लगता है, इस फैसले का समाज पर क्या असर होगा?

इंदिरा जयसिंह: दिसंबर 2012 के बाद के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले अब ज्यादा दर्ज हो रहे हैं. इसके दो कारण हैं: एक तो यह कि इस मामले के बाद से मीडिया में और लोगों में भी इस पर बहुत चर्चा होने लगी है और दूसरा यह कि कानून बदले हैं. बलात्कार के मामले में अब सख्ती दिखाई जा रही है. इसके आलावा अगर कोई पुलिसकर्मी रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दे तो उसे भी अपराध के दायरे में लाने की कोशिश की गई है.

क्या इस फैसले के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में कमी होने की उम्मीद की जा सकती है?

कुछ दिनों पहले ही एक और बलात्कार की खबर आई. मुंबई में कुछ पुरुषों ने मिल कर 22 साल की एक पत्रकार पर हमला किया. यह मामला दिखाता है कि समाज में लोगों की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है और इससे यह भी पता चलता है कि 16 दिसंबर की बर्बर घटना के बाद भी अपराधियों में कोई डर पैदा नहीं हुआ है.

हमारे शहर आज भी पहले की ही तरह असुरक्षित हैं क्योंकि अब पहले की तुलना में और भी ज्यादा महिलाएं नौकरी के लिए या फिर और किसी काम के लिए बाहर निकलती हैं. इसलिए उन पर यौन उत्पीड़न का खतरा भी बढ़ गया है. महिलाएं खुद को महफूज नहीं समझती और अदालत का केवल एक फैसला उन्हें सुरक्षित महसूस कराने के लिए काफी नहीं है. हमने देखा है कि कानूनों में बदलाव के बावजूद शहरों में महिलाओं का बलात्कार हो रहा है.

महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

हमें अपनी न्यायप्रणाली में बदलाव लाने होंगे. ऐसे मामलों में हमें जल्द से जल्द फैसला लेने की हालत में आना होगा और ज्यादा से ज्यादा अपराधियों को सजा दिलानी होगी. हमने कई बार देखा है कि बलात्कार करने वालों को आजाद छोड़ दिया जाता है. साथ ही हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जांच अच्छी तरह हो और सजा को भी अमल में लाया जाए. अगर लोगों को पता चले कि बलात्कार की सजा अपराधी को जरूर मिलेगी तो लोगों का विश्वास बढ़ेगा. यह सजा के कड़े होने के मुकाबले ज्यादा असरदार होगा. अब भी हमारे यहां यह बात सही है, कि न्याय में देरी अपने आप में अन्याय है. पूरी न्यायप्रणाली को महिलाओं पर हो रहे अपराधों को लेकर और संवेदनशील होना होगा. भारत को ऐसे जजों की जरूरत है जो महिला अधिकारों के लिए और ठोस कदम उठा सकें.

ऐसे मामलों में सजा की उम्र को 18 से घटा कर 16 कर देने की जो मांग हो रही है, उस बारे में आपका क्या कहना है?

ऐसी मांगें बेबुनियाद हैं. जाहिर सी बात है कि पीड़ित के माता पिता चाहते हैं कि अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा मिले, लेकिन कानून किसी अपराध का बदला नहीं लेता, वह सबक सिखाता है. 18 साल से कम उम्र के किशोर को आप जीवन भर के लिए सजा नहीं दे सकते. अगर हम ऐसा करते हैं तो हम उसे एक खुंखार अपराधी बना देंगे.

सजा की उम्र तय करने की बात मनमानी जैसी लग सकती है, लेकिन आप यह समझकर चलते हैं कि 18 साल से कम उम्र के लोग इस हालत में नहीं हैं कि वे अपने किए की पूरी जिम्मेदारी ले सकें. अगर हम सामूहिक बलाक्तार के पिछले मामलों पर नजर डालें, तो हम पाएंगे कि ज्यादातर अपराधी समाज के पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर तबके से आते हैं. उनके पास जीवन की सबसे कम सुविधाएं हैं. अगर उन्हें हम आजीवन कारावास देंगे तो यह मानवाधिकारों का बड़ा उल्लंघन होगा, यह उनके किए जुर्म जैसा ही होगा. युवा खुद को बदल सकते हैं और कानून को इसके लिए बुनियाद बनानी है.

महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने में समाज क्या भूमिका निभा सकता है?

हमें यह बात समझनी होगी कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां बहुत से अंतर हैं. इस समाज ने एक ऐसा निचला तबका बना दिया है जो अपराध के सहारे जीता है, जिसे हम 'लुम्पनप्रोलिटारियाट' कह सकते हैं. एक समाज के तौर पर हमें इसे बदलना होगा. हमें यह बात समझनी होगी कि अगर हम खुद को सभ्य समाज कहलाना चाहते हैं तो हमें महिलाओं की इज्जत करनी होगी और उन्हें सम्मान के साथ जीने देना होगा.

इंदिरा जयसिंह सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं और 'लॉयर्स कलेक्टिव' नाम के गैर सरकारी संस्थान की संस्थापक हैं. वह भारत की पहली महिला अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल चुनी गईं थी.

इंटरव्यूः गाब्रिएल दोंमिंगेज/आईबी

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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