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ब्लॉग

भारत को नींद से जगाने वाली परियोजना है ओबोर

भारत ने चीन के न्यू सिल्क रूट सम्मेलन में भाग नहीं लिया. कुछ इसे भारत की गलती बता रहे हैं लेकिन इसमें मौके भी छुपे हैं. कुलदीप कुमार का कहना है कि इसने भारत को नींद से जगाने का काम किया है.

चीन की महत्वाकांक्षी ‘वन बेल्ट वन रोड' (ओबीओआर) योजना ने विश्व का ध्यान तो अपनी ओर खींच ही रखा है, खासकर चीन के पड़ोसी देश इसकी ओर बहुत ललचाई नजरों से देख रहे हैं. उन्हें लगता है कि जब 900 अरब डॉलर की इतनी बड़ी धनराशि खर्च की जाएगी तो उसका कुछ न कुछ हिस्सा तो सभी को मिलेगा. बीजिंग में सम्पन्न हुए दो-दिवसीय बेल्ट एंड रोड फोरम (बीआरएफ) में भूटान को छोड़ कर भारत के सभी पड़ोसी देश इकट्ठा हुए, लेकिन भारत इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अनुपस्थित रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के आलोचक इसे विदेशनीति के मोर्चे पर सरकार की एक और विफलता बता रहे हैं क्योंकि भारत इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ गया है, लेकिन वहीं कुछ अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अभी भी इस योजना से लाभ उठा सकता है, बशर्ते वह अपने पत्ते सोच-समझकर खेले.

इस परियोजना का एक हिस्सा चीन और यूरेशिया के बीच सड़क एवं रेल संपर्क स्थापित करना है और दूसरा हिस्सा चीन को सामुद्रिक रास्तों के जरिये दक्षिण-पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया एवं अफ्रीका के पूर्वी तट पर स्थित बंदरगाहों से जोड़ना है. यदि वह इस प्रयास में सफल हो जाता है, तो इस परियोजना के अंतर्गत स्थापित व्यापारिक संपर्कों के तहत दुनिया की 65 प्रतिशत आबादी, एक-तिहाई वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और विश्व अर्थव्यवस्था की समस्त वस्तु एवं सेवाओं का एक-चौथाई हिस्सा आ जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि जहां अमेरिका, विकसित यूरोपीय देश और रूस इस परियोजना में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं, वहीं चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के मुद्दे पर विरोध जता कर भारत ने इससे किनारा कर लिया है. यह कॉरिडोर जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्र में से होकर गुजरता है जिस पर भारत का दावा है.

लेकिन सी. राजामोहन जैसे विदेशनीति के जानकार इसमें भी सकारात्मक तत्व देख रहे हैं. उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर विवाद में असल में भारत और पाकिस्तान---ये दो पक्ष ही नहीं हैं. इसमें चीन शुरू से ही एक पक्ष रहा है लेकिन भारत इस तथ्य की अनदेखी करता रहा है. चीन ने आर्थिक कॉरिडोर में भागीदारी के लिए भारत को भी आमंत्रित किया है. भारत को इस पेशकश को स्वीकार करके देखना चाहिए कि चीन और पाकिस्तान इस मामले में कितने ईमानदार हैं. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के सामरिक महत्व को पूरी तरह से इस्तेमाल करके भारत चीन की सामुद्रिक महत्वाकांक्षाओं का सामना कर सकता है. भारत ने हमेशा अपने सीमांत प्रदेशों के महत्व को नजरंदाज किया है और इसका खामियाजा भी भुगता है. चीन की ओबीओआर परियोजना इन सीमांत प्रदेशों में उसकी स्थिति को और भी अधिक कमजोर कर सकती है यदि उसने अभी से वहां के ढांचागत विकास पर ध्यान नहीं दिया.

इस परियोजना ने भारत को नींद से जगाने का काम किया है वरना अचानक मोदी सरकार की ओर से उन परियोजनाओं की शिनाख्त न की जाती जो बरसों से उपमहाद्वीप का पड़ोसी देशों, दक्षिण-पूर्व एशिया और खाड़ी के देशों के साथ कनेक्टिविटी यानी सड़क, रेल, जलमार्ग और वायुमार्ग द्वारा संपर्क बढ़ाने के लिए चल रही हैं. लगता है अब उन्हें समाप्त करने पर सरकार विशेष ध्यान देने वाली है.

मोदी सरकार के आलोचकों का कहना है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडॉर पर उसका आपत्ति करना बिलकुल उचित था लेकिन इस आधार पर उसे दो-दिवसीय सम्मेलन का बहिष्कार नहीं करना चाहिए था और उसमें भाग लेकर वहां अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने अपनी बात रखनी चाहिए थी. चीन पाकिस्तान के ग्वादर बन्दरगाह और श्रीलंका के हमबंटोटा बन्दरगाह के साथ सीधे जुड़कर अपनी सामुद्रिक शक्ति में कई गुना वृद्धि करने वाला है. ऐसे में भारत को अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी. अलग-थलग पड़ जाना उसके हित में नहीं है.

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