भारत के लिए जानलेवा टीबी | दुनिया | DW | 24.10.2014
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दुनिया

भारत के लिए जानलेवा टीबी

भारत दुनिया में ऐसा देश बन गया है जहां टीबी के सबसे ज्यादा मामले दर्ज ही नहीं होते. दर्ज नहीं होने वाले मामलों में विश्व में हर चौथा मामला भारत का होता है.

साल 2013 के दौरान दुनिया के दस देशों में करीब 24 लाख तपेदिक के मामले दर्ज ही नहीं हुए. मिस्ड या चूके हुए मामलों का मतलब होता है बीमारी के कुल मामलों और दर्ज किए हुए (नए और संक्रमण का दोबारा होना) मामलों में अंतर. 2013 में दुनिया भर में 90 लाख टीबी के मामले थे जिनमें से सिर्फ 57 लाख ही पहचाने गए और नेशनल टीबी प्रोग्राम (एनटीपी) में दर्ज किए गए.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इससे पता चलता है कि 33 लाख टीबी के मरीज ऐसे हैं जिन्हें दर्ज नहीं किया गया. इसका कारण यह भी हो सकता है कि या तो इन मामलों को पहचाना ही नहीं गया, या फिर बीमारी की पहचान तो हुई लेकिन इसकी रिपोर्ट नहीं हुई. "देशों में टीबी के बोझ के कारण साथ ही दर्ज मामलों और संभावित मामलों में बड़े अंतर को देखते हुए भारत में केस दर्ज करने में बेहतरी का असर वैश्विक होगा."

2013 में टीबी के कुल मामले 90 लाख हो गए थे जबकि 2012 में यह आंकड़ा 86 लाख का था. पिछले साल करीब 15 लाख लोगों की टीबी से मौत हो गई, इनमें से तीन लाख साठ हजार लोग ऐसे थे जो एचआईबी पॉजिटिव भी थे.
भारत, पाकिस्तान और चीन में टीबी के मामले इतने ज्यादा होने के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन में वैश्विक टीबी अभियान के वरिष्ठ महामारी विशेषज्ञ फिलिपे ग्लैस्यू ने डीडबल्यू से कहा, "चीन में इसके ज्यादा होने का कारण सिर्फ उसकी जनसंख्या है. लेकिन प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से अगर देखा जाए तो चीन में टीबी का भार भारत और पाकिस्तान की तुलना में बहुत कम है.

टीबी होने का मुख्य कारण तो गरीबी, भीड़, बहुत ज्यादा धूम्रपान, मधुमेह, पहले का खराब टीबी नियंत्रण है. इन मरीजों का इलाज नहीं हो पाने का मुख्य कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है. अक्सर खराब सुरक्षा के कारण ये मामले क्लीनिक या अस्पतालों के जरिए भी फैल सकते हैं. खराब स्वास्थ्य सुविधाओं या गलत दवाओं के कारण दवा प्रतिरोधी तपेदिक के मामले बढ़ने की भी आशंका होती है.
2013 में टीबी के सबसे ज्यादा मामले दक्षिण पूर्वी एशिया और पश्चिमी प्रशांत देशों में दर्ज हुए, इनमें भारत में 24 फीसदी और चीन में 11 फीसदी मामले दर्ज किए गए. नई रिपोर्ट के मुताबिक मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी अभी भी संकट का कारण है. इस साल करीब चार लाख अस्सी हजार मामले दर्ज किए गए.

टीबी के अलावा एक अन्य बीमारी जो भारत के लिए बड़ा खतरा बनी हुई है वह है रेबीज. कुत्ते, बिल्लियों के काटने पर फैलने वाली ये बीमारी अभी भी दुनिया में 69,000 लोगों की जान लेती है जिसमें से एक तिहाई मामले भारत के हैं. इसके फैलने का कारण आवारा कुत्ते हैं, जो भारत की सड़कों पर घूमते हैं. साथ ही सेहत और सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा हैं.

रिपोर्टः आभा मोंढे (रॉयटर्स, एएफपी)

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