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ब्लॉग

भारत के लिए चुनौती है भुखमरी से पार पाना

आबादी के लिहाज से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश भारत के लिए भुखमरी की समस्या एक कलंक है. यह बात अलग है कि प्रशासन और सरकारें इस शब्द से छूत की तरह परहेज करती रही हैं, इसलिए इसके खिलाफ कोई कारगर कदम नहीं उठाया जा सका है.

लेकिन इससे यह हकीकत नहीं छिप जाती कि दुनिया भर में भुखमरी का शिकार होने वाले कुल लोगों का एक-चौथाई भारत में ही रहता है. यह स्थिति तब है जब यह अतिरिक्त खाद्यान्न उत्पादन वाला देश है. दरअसल, तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था के बावजूद हर साल भुखमरी का शिकार होने वालों की बड़ी तादाद को ध्यान में रखते हुए लगता है कि इस समस्या से निपटने में सरकारी सोच और नीतियां ही सबसे बड़ी बाधक हैं. आंकड़ों के हवाले यह तस्वीर और साफ हो जाती है.

भुखमरी और कुपोषण का चोली-दामन का संबंध है. विश्व में खाद्य असुरक्षा की स्थिति, 2014 शीर्षक एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 19.07 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं. इसी रिपोर्ट के मुताबिक, देश में रोजाना 19 करोड़ लोग भूखे सोने पर मजबूर हैं. भूख को मापने का एक अंतर्राष्ट्रीय मानक है, बाडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई. यह किसी व्यक्ति के कद के हिसाब से उसके वजन की स्वीकार्य सीमा बताता है. एक सामान्य बीएमआई के लिए अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्य सीमा 18.5 है. 17 से 18.4 की बीएमआई वाले को कुपोषित कहा जाता है और 16.0 से 16.9 के बीच वाले को गंभीर रूप से कुपोषित कहा जाता है. इसी तरह 16 से कम बीएमआई वाले को भुखमरी का शिकार कहा जाता है.

अनाज के बावजूद भुखमरी

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 35.6 फीसदी महिलाओं और 34.2 फीसदी पुरुषों का बीएमआई 18.5 से कम है. तीन साल पहले योजना आयोग की भारतीय मानव विकास रिपोर्ट में कहा गया था अगर भारत अकाल वाली स्थिति में नहीं है, तो निश्चित तौर पर भयंकर भुखमरी की चपेट में तो है ही. देश में अतिरिक्त अनाज होता है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2014 में भारत का स्थान 55वां (76 देशों में) है. वर्ष 2013 में इस सूची में उसका 63वां स्थान था. बीते दो वर्षों में मामूली सुधार के बावजूद स्थिति अब भी चिंताजनक है.

फिलहाल पश्चिम बंगाल के चाय बागान वाले उत्तरी क्षेत्र, मध्य प्रदेश, ओडीशा और झारखंड भुखमरी की समस्या से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं. भुखमरी के चलते एक हजार से ज्यादा चाय बागान मजदूरों की मौत हो चुकी है तो इस मामले में ओडीशा का कालाहांडी दशकों से देश-विदेश में सुर्खियां बटोरता रहा है. वर्ष 1943 में बंगाल के भीषण अकाल के दौरान 30 से 40 लाख लोग भुखमरी के शिकार हो गए थे. देश में तब भी अनाज की कमी नहीं थी. यह इसी तथ्य से साफ है कि भारत ने उसी साल इंग्लैंड को 70 हजार टन चावल का निर्यात किया था. अब भी खाद्यान्नों की कोई कमी नहीं है. कृषि उत्पादन हर साल तेजी से बढ़ रहा है.

विफल सरकारी नीतियां

तो फिर आखिर इस भुखमरी की वजह क्या है? पहली वजह है सरकारी नीतियों को लागू करने में खामी. इसकी वजह से हर मुंह तक भोजन पहुंचाने वाली योजनाएं निचले स्तर तक नहीं पहुंच पातीं. देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार ने लोगों को अकाल मौत मरने पर मजबूर कर दिया है. इसके जरिए वितरित होने वाले अनाज का 52 फीसदी या तो वितरण, परिवहन और भंडारण व्यवस्था की खामियों के चलते नष्ट हो जाता है या फिर खुले बाजार में ऊंची दर पर बेच दिया जाता है. इसके अलावा पोषण से भरपूर और बेहतर क्वालिटी के खाद्यान्न खरीदने के मामले में आम लोगों की खरीदने की क्षमता भी भुखमरी पर काबू पाने की राह में एक प्रमुख बाधा है. गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग ऐसा भोजन खरीदने में सक्षम नहीं हैं. नतीजा यह है कि वे धीरे-धीरे कुपोषण के शिकार होकर भुखमरी की ओर बढ़ते रहते हैं.

भुखमरी पर अंकुश लगाना सरकार के लिए एक कड़ी चुनौती है. लेकिन इसके लिए पहले उसकी जड़ यानी कुपोषण को दूर करना जरूरी है. सबको बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और पोषण से भरपूर भोजन मुहैया कराने के लिए सरकारी नीतियों में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है. लेकिन जहां सरकारें भुखमरी को मानने के लिए ही तैयार नहीं हों, वहां वे उससे निपटने की दिशा में कोई ठोस पहल भला कैसे करेंगी? यानी निकट भविष्य में भारत को इस गंभीर समस्या से जूझते रहना होगा.

ब्लॉग: प्रभाकर

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