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ब्लॉग

भारत के प्रवासी मजदूरों की चिंता किसे है

कुशल श्रम की तो कद्र है लेकिन अकुशल कामगारों के लिए देश हो या विदेश हालात विडम्बनापूर्ण ही हैं. खाड़ी देश कतर के प्रवासी श्रम कानूनों और मजदूरों की मौतों के हवाले से एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट भी यही बताती है.

डॉक्टरी, इंजीनियरी या ऐसा ही ऊंचा काम करने विदेश जा रहे हैं तो शायद आपको दिक्कत न आएं, लेकिन अगर कोई छोटा कामगार या मजदूर परिवार का पेट पालने विदेश निकलता है तो ये सफर जोखिम भरा और जानलेवा हो सकता है. खाड़ी के अमीर देश कतर गए भारतीय मजदूरों की बदहाली की खबरें भी यही बताती हैं. प्रवासी भारतीय कामगारों की सुरक्षा दांव पर लगी है. देशों के श्रम कानून क्या अपने यहां काम करने वाले विदेशी मजदूरों और छोटे कामगारों के प्रति उदासीन और निष्ठुर हैं, ये सवाल एक बार फिर उठने लगे हैं.

खाड़ी का एक अत्यंत अमीर देश है कतर जो पिछले कुछ समय से विवादों में है. 2022 के विश्वकप फुटबॉल आयोजन के लिए जो बेशुमार निर्माण कार्य वहां हो रहा है उसमें दक्षिण एशिया के देशों के भी कामगार गए हैं. खासकर भारत और नेपाल से. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कतर के विश्व कप आयोजन और तैयारियों की रोशनी में एक रिपोर्ट तैयार की है जिसमें प्रवासी भारतीयों की मौतों पर सवाल उठाए हैं. भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के हवाले से उसने कहा है कि पिछले एक साल में 289 भारतीय कामगारों की कतर में मौत हुई है. हालांकि ये साफ नहीं है कि इनमें से कितने मजदूर थे और विश्व कप निर्माण कार्य में लगे थे.

मीडिया में भी इस पर परस्पर विरोधी आंकड़े और आकलन आ रहे हैं. कई रिपोर्टे ये इशारा करती हैं कि कतर श्रम कानूनों की घोर अनदेखी कर रहा है, जिसका फायदा निर्माण कार्य में लगी कंपनियां उठा रही हैं और वे बाहर से आए मजदूरों का शोषण कर रही हैं. ये रिपोर्टे बताती हैं कि वहां बहुत तंग हालात में गुजर बसर कर रहे मजदूर बेबस हो जाते हैं क्योंकि उनके पासपोर्ट भी कंपनियां ही रख लेती हैं और उन्हें पहचान पत्र भी नहीं दिया जाता है. इस तरह से वे एक तरह की कैद में रहने को विवश होते हैं. पिछले चार साल में करीब एक हजार प्रवासी भारतीयों की कतर में मौत हुई है.

लेकिन इन आंकड़ों को अलग रोशनी में परखती हुई रिपोर्टें भी आई हैं जो बताती हैं कि कतर में रहने वाले कुल भारतीयों की संख्या को देखते हुए ये मौतें नगण्य हैं. विदेशी कामगारों में सबसे ज्यादा संख्या कतर में भारतीयों की है और ये छह लाख से ज्यादा है. इसमें मजदूरों के अलावा डॉक्टरी, इंजीनियरी जैसे पेशों में शामिल भारतीय भी हैं. जिनकी स्थितियां जाहिर है बेहतर हैं. रही बात मौतों की तो ये सिर्फ विश्व कप आयोजन के निर्माण कार्य से जुड़ी हों, ऐसा नहीं है. उनकी अलग अलग वजहें हैं और कई मौतें सामान्य की श्रेणी में आती हैं.

आंकड़ों और परस्पर-विरोधी रिपोर्टों से इतर ये तो शायद सभी मानेंगे कि खाडी देशों में मजदूरी जैसे छोटे-मोटे काम करने के लिए गए प्रवासी भारतीयों की जीवन परिस्थितियां आकर्षक नहीं हैं. हाड़तोड़ मेहनत, बेतहाशा तापमान, पोषणयुक्त आहार की कमी, रहने के लिए पर्याप्त जगह का अभाव, ये सारी मुसीबतें तो उनकी बनी हुई हैं. कई मामलों में कंपनियों का रवैया भी अनुदार ही पाया जाता है जैसे पासपोर्ट अपने पास रख लेना या पहचान पत्र जारी न करना आदि.

कतर के साथ भारत के व्यापार और निवेश संबंधी दोतरफा समझौते हैं. इन समझौतों में अब प्रवासी मजदूरों के लिए काम का न्यायसंगत माहौल बनाने पर भी खुलकर बात की जानी चाहिए ताकि कंपनियां मनमानी न कर सकें. इसके लिए भारतीय दूतावास को भी अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी और अपने नागरिकों की स्थितियों की दरयाफ्त करते रहनी होगी. भारत में उपलब्ध सस्ता श्रम, विकसित, अमीर और तेल भंडार से समृद्ध खाड़ी देशों को लुभाता है. इन कामगारों का अकेला बोनस होता है अपना अस्तित्व. भारत सरकार को बुरे हालात में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों के लिए काम की बेहतर स्थितियां सुनिश्चित कराने के लिए दबाव बनाना चाहिए.

अपने प्रायोजकों और नियोक्ताओं के रहमोकरम पर टिके रहने की विवशता के साथ इन मजदूरों का काम करना, उस देश के लिए तो शर्मनाक है ही, उस देश को भी सोचना चाहिए कि आखिर दुनिया में तेजी से उभरती अपनी जिस शक्ति का डंका वो पीटता आ रहा है, वो शक्ति इन मामलों में कहां काफुर हो जाती है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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