भारत के पास नेपाल को चीन से ′छीनने′ का पहला मौका | दुनिया | DW | 14.09.2016
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

भारत के पास नेपाल को चीन से 'छीनने' का पहला मौका

पूर्व माओवादी नेता प्रचंड ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत को अपने पहले विदेश दौरे के लिए चुना है. पिछले एक साल में दोनों देशों के बीच संबंधों का संतुलन खासा गड़बड़ा गया है.

भारत नेपाल को ऐसी कई पेशकश कर सकता है, जो उसे चीन से खींचकर अपने पाले में मदद कर सकें. इनमें ईस्ट-वेस्ट रेलवे लाइन के निर्माण जैसे प्रोजेक्ट भी हैं. नेपाल के नए प्रधानमंत्री प्रचंड अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर इस हफ्ते भारत आ रहे हैं. इस दौरान भारत नेपाल में अपनी खोई जमीन फिर से वापस पाने की कोशिश करेगा.

पूर्व माओवादी नेता प्रचंड ने दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत को अपने पहले विदेश दौरे के लिए चुना है. पिछले एक साल में दोनों देशों के बीच संबंधों का संतुलन खासा गड़बड़ा गया है और जानकार मानते हैं कि प्रचंड और भारत दोनों इसे ठीक करने की कोशिश करेंगे. नेपाल के पिछले प्रधानमंत्री केपी ओली के शासन में चीन से उसकी नजदीकियां बढ़ गई थीं. भारत पर आर्थिक निर्भरता खत्म करने के मकसद से ओली ने चीन के साथ कई व्यापार समझौते किए थे. इससे भारत भी उखड़ गया था. और फिर नए संविधान में मधेसियों को सही प्रतिनिधित्व न देने के आरोपों के चलते दोनों देशों के रिश्ते और ज्यादा खराब हुए. अब प्रचंड उन्हें सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. काठमांडू में उन्होंने रिपोर्टरों से कहा, "कुछ समय से भारत के साथ रिश्ते धुंधला गए हैं. मैं उस कड़वाहट को दूर करना चाहता हूं." उन्होंने कहा कि नेपाल मुश्किलों से घिरा है और भारत उसकी मदद करना चाहता है.

बिना वीसा के घूम आइए ये देश

भारत और नेपाल के बीच रार का कारण बने नए संविधान पर अभी सब कुछ ठीकठाक नहीं हुआ है. मधेसियों ने इस संविधान का विरोध किया था और नेपाल का आरोप था कि भारत इस विरोध आंदोलन को हवा दे रहा है. इस वजह से सीमा पर नाकेबंदी हो गई थी और नेपाल में ईंधन और दवाओं जैसे जरूरी चीजों की भी भारी कमी हो गई थी. यह नाकेबंदी पांच महीने चली थी.

प्रचंड गुरुवार को भारत पहुंचेंगे और चार दिन रहेंगे. इस दौरान पूर्वी नेपाल में मेची से पश्चिम में महाकाली तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना पर चर्चा होगी. इस परियोजन में नेपाल को भारत के सहयोग की उम्मीद है. एक भारतीय रेलवे अधिकारी के मुताबिक नेपाल के 1030 किलोमीटर लंबे ईस्ट-वेस्ट हाईवे के समानांतर चलने वाली इस रेलवे लाइन के बारे में पहले भी दोनों देशों के बीच चर्चा हो चुकी है और अब बात वित्तीय पहलुओं तक पहुंच चुकी है.

जानिए, कैसा है नेपाल का नया संविधान

प्रचंड की यात्रा से पहले तैयारियों में जुटे एक अधिकारी ने बताया, "योजना यह है कि इस परियोजना को जल्दी से आगे बढ़ाया जाए." फिलहाल नेपाल में बस एक छोटी रेल लाइन है जो जयनगर को भारतीय सीमा तक जनकपुर से जोड़ती है. एक और प्रोजेक्ट, जिस पर प्रचंड के दौरे में बात हो सकती है वह पनबिजली योजना है जो भारत की राहत राशि से बनाई जानी है.

नेपाल उन छोटे एशियाई देशों में से है जिन पर चीन और भारत दोनों की नजरें रहती हैं. दोनों देश इन छोटे मुल्कों पर अपना प्रभाव बढ़ाने की जुगत में रहते हैं. भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक और प्रगाढ़ संबंध रहे हैं. राजशाही के समय में तो नेपाल पूरी तरह भारत पर निर्भर रहता था लेकिन पिछले एक दशक में लोकतांत्रिक सरकार के दौरान चीजें काफी बदली हैं. अब चीन वहां सड़कें और अस्पताल आदि बना रहा है जबकि भारत के बेहद पुराने वादे भी अब तक जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं. देश में पनबिजली संयंत्र और ट्रांजिट कॉरिडोर दो ऐसी ही योजनाएं हैं जो राजनीतिक उथल-पुथल में बरसों से फंसी हुई हैं.

नेपाल के इस बुजुर्ग छात्र को तो सलाम बनता है

DW.COM

संबंधित सामग्री