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विज्ञान

भारत की स्वास्थ्य सेवा में विदेशी निवेशक

गैर सरकारी इक्विटी फंड ने भारत में प्राइमरी स्वास्थ्य सेवाओं ने अपना निवेश चौगुना बढ़ा दिया है. उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही भारतीय मरीज अपने करीबी डॉक्टरों को छोड़कर भारत भर में फैल रहे आधुनिक अस्पतालों में आने लगेंगे.

गोल्डमैन सैक्स, वारबुर्ग पिंकुस, सेकुया कैपिटल और सिंगापुर इंवेस्टमेंट कॉर्प उन निवेशकों में शामिल हैं, जिन्होंने इस साल भारत के बेसिक हेल्थकेयर उद्योग में 52 करोड़ डॉलर उड़ेले हैं. 2011 में इस क्षेत्र में करीब पौने 14 करोड़ डॉलर का निवेश हुआ था. कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि 2013 में निवेश एक अरब डॉलर की सीमा पार कर जाएगा.

अपोलो हॉस्पिटल्स और फोर्टिस हेल्थकेयर जैसे संगठित क्षेत्र की कंपनियों का अनुमान है कि और ज्यादा मरीज बेहतर सुविधाओं से लैस क्लीनिकों में दो से तीन गुना ज्यादा फीस देने को तैयार होंगे. इन क्लीनिकों का मॉडल ऐसा है कि उन्हें तेजी से दूसरे शहरों में लागू किया जा सकता है और निवेशकों को शीघ्र मुनाफे की संभावना देता है. "पारिवारिक डॉक्टरों वाला मॉडल पुराना पड़ता जा रहा है," यह कहना है नेशनवाइड प्राइमरी हेल्थकेयर सर्विसेज के प्रमुख सांतनु चट्टोपाध्याय का. इस कंपनी में अमेरिका के नॉरवेस्ट वेंचर ने 46 लाख डॉलर का निवेश किया है.

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में संभावनाएं व्यापक हैं. हेल्थकेयर का असंगठित इलाका करीब 30 अरब डॉलर का है और हर साल 25 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. निजी क्लीनिकों की सबसे बड़ी चुनौती लोगों को यह समझाना होगा कि वे भरोसे के पारिवारिक डॉक्टरों को छोड़कर उनके पास आएं.

मुंबई स्थित कंसल्टेंट शांतनु देब मुखर्जी के अनुसार भारत के प्राइमरी हेल्थकेयर सेक्टर में आने वाले सालों में हर साल एक अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश होने की संभावना है. वे कहते हैं, "सिंगल स्पेशिएलिटी चेन और डायग्नोस्टिक लैब खेल के नियम बदलने वाले साबित होंगे. उन्हें शुरु करना और बाद में जरूरत के मुताबिक बढ़ाना आसान है." दूसरा आकर्षण यह है कि इनमें बहुत ज्यादा खर्च नहीं होता, इसलिए निवेशकों पर बहुत ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा. साथ ही बीमा या टेलीकॉम जैसे दूसरे क्षेत्रों के विपरीत इसमें विदेशी मालिकाने पर रोक नहीं है.

Neu Delhi Smog

निवेशकों को खींचता मुनाफा

रेस्तरां चेन की तरह क्लीनिक

भारत में बढ़ती क्रय शक्ति के कारण निवेशक रेस्तरां चेन की तरह क्लीनिक खोलने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. हालांकि इसमें मुनाफा रिटेल से कम है. फूड और उपभोक्ता चेन के 15 से 18 फीसदी के मुकाबले ईकाई आंकड़े वाला मुनाफा. लेकिन यदि हेल्थकेयर चेन के ऑपरेटर रेस्तरां की तरह फ्रेंचाइजी मॉडल अपनाते हैं तो मुनाफा बढ़ सकता है. इसके तहत हेल्थ केयर ऑपरेटर फ्रेंचाइजी लेने वाले को अपने ब्रांड का इस्तेमाल करने की अनुमति देगा और फीस लेकर जानकारी और सपोर्ट मुहैया कराएगा.

भारत में इस साल आम निवेश में 17 फीसदी की कमी आई है और वह गिरकर 3.3 अरब डॉलर हो गया है. लेकिन हेल्थकेयर क्षेत्र की हालत बेहतर रही है. आईसीआईसीआई वेंचर की प्रमुख विशाखा मूले कहती हैं, "छोटे अस्पतालों के चेन से स्पेशल इलाज करने वाले क्लीनिक, हम संस्थागत गतिविधि में तेजी देख रहे हैं, जो ढेर सारा संस्थागत निवेश आकर्षित कर सकती है."

लेकिन मरीजों का दिल जीतना सबसे बड़ी चुनौती होगी. आईबीएम के लिए काम करने वाले चंद्रशेखर खंडके कहते हैं, "मैं अनाज किराने की दुकान से खरीदता हूं या सुपर बाजार से बहुत फर्क नहीं है, लेकिन जब स्वास्थ्य की बात होती है, तो परिवार का डॉक्टर बहुत मायने रखता है."

ठाणे में 75 वर्गमीटर का छोटा सा क्लीनिक चलाने वाले डॉक्टर अनिल आडवाणी कहते हैं, इन चेनों का विशिष्ट ब्रांड है, लेकिन भरोसेमंद डॉक्टरों का उससे भी बड़ा ब्रांड है."

एमजे/ओएसजे (रॉयटर्स)

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