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ब्लॉग

भारत की दिलचस्पी निवेश लाने में

ऑस्ट्रेलिया में हो रहे जी-20 सम्मेलन में भारत ब्लैकमनी पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग करेगा. कुलदीप कुमार का कहना है कि उसे अंतरराष्ट्रीय बैंक ट्रांसफर को आसान और सस्ता बनाने की भी पहल करनी चाहिए.

दुनिया के चोटी के बीस देशों के इस समूह का महत्व इसी बात से पता चल जाता है कि इसके सदस्य देशों में विश्व की कुल आबादी के 66 प्रतिशत लोग रहते हैं और विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 85 प्रतिशत इन्हीं देशों से आता है. यही नहीं, पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष जितना कार्बन उत्सर्जन होता है, उसके 76 प्रतिशत के लिए भी ये देश ही जिम्मेदार हैं. पिछ्ले कुछ वर्षों के दौरान जी-20 देशों का शिखर सम्मेलन वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा को निर्णायक ढंग से प्रभावित करने वाला मंच बन गया है.

शिखर सम्मेलन से ठीक पहले अमेरिका और चीन ने मौसम परिवर्तन के बारे में एक समझौता करके भारत के सामने मुश्किल खड़ी कर दी है क्योंकि कार्बन उत्सर्जन के मामले में इन दोनों देशों के बाद भारत का ही नंबर आता है. लेकिन इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि छह प्रतिशत उत्सर्जन करने वाला भारत इस मामले में चीन से काफी पीछे है और उसका कार्बन उत्सर्जन चीन के कार्बन उत्सर्जन का लगभग एक-तिहाई ही है. ब्रिस्बेन में भारत पर कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कोई महत्वपूर्ण घोषणा करने का दबाव जरूर होगा लेकिन वह फिलहाल इस दिशा में कोई बड़ी घोषणा करने वाला नहीं है. हां, वह 2007 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा किए गए इस वादे को दुहरा सकता है कि किसी भी सूरत में उसका प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन विकसित देशों के प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन से अधिक नहीं होगा.

दरअसल भारत का जोर आर्थिक विकास और आर्थिक निवेश के लिए निवेशकों को आकृष्ट करने पर रहेगा क्योंकि इनके माध्यम से ही देश में रोजगार बढ़ाया जा सकता है. उसे इस शिखर सम्मेलन के मंच का इस्तेमाल विदेशों से धन भेजने पर आने वाले खर्च को कम करवाने के लिए करना चाहिए क्योंकि इससे धन भेजने वाले भारतीयों को भी फायदा होगा और भारत की अर्थव्यवस्था को भी. यही नहीं, फिलीपींस और दक्षिण एशिया में भारत के अन्य पड़ोसियों को भी इससे लाभ होगा.

इस समय यह स्थिति है कि कभी-कभी विदेश से धन भेजने की फीस कुल रकम के दस प्रतिशत तक पहुंच जाती है. विदेशों में काम करने वाले भारतीयों की संख्या किसी भी अन्य देश के नागरिकों से अधिक है. 2014 में प्रवासी कामगारों द्वारा भेजी जाने वाली कुल अनुमानित राशि 582 अरब डॉलर थी जिसका 12 प्रतिशत भारतीयों ने अपने देश भेजी. प्रवासी मजदूरों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि कई विकासशील देशों के सकल घरेलू उत्पाद का 20 प्रतिशत तक है. जाहिर है कि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और यदि भारत इसे उठाता है तो उसे अन्य विकासशील देशों का समर्थन भी आसानी से प्राप्त होगा.

स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेत दिया है कि वह शिखर सम्मेलन में अगली पीढ़ी के यानि अब की तुलना में अधिक विकसित बुनियादी ढांचे के निर्माण पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल देंगे और इसमें डिजिटल ढांचे का निर्माण भी शामिल होगा. इसके अलावा उनकी प्राथमिकताओं में ऐसी ऊर्जा उपलब्ध करना होगा जो न केवल स्वच्छ हो बल्कि जिस तक सभी की पहुंच भी हो.

हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था के विकास की गति धीमी हो गई है, लेकिन इसके बावजूद वह विश्व की उभरती हुई आर्थिक शक्ति है. इसलिए अब पश्चिमी देशों के लिए उसके विचारों और उसकी जरूरतों को नजरंदाज करना उतना आसान नहीं रह गया है. जी-20 शिखर सम्मेलन की अंतर्वस्तु मुख्यतः आर्थिक है, भले ही वह कार्बन उत्सर्जन का मुद्दा हो या वैश्विक अर्थव्यवस्था के स्थापत्य में बदलाव का. देखना होगा कि नरेंद्र मोदी भारत के पक्ष को कितनी मजबूती से वहां रख पाते हैं.

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