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दुनिया

भारत की ईरान नीति पर सवाल

ईरान के मुद्दे पर भारत अमेरिकी और यूरोपीय संघ के सभी प्रतिबंधों को लागू करने में हिचकिचा रहा है. अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अपने ऐतिहासिक रिश्तों की वजह से पश्चिम का साथ नहीं दे रहा है.

अमेरिकी संसद की दोनों पार्टियों वाली कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, "संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर जो पाबंदियां लगाई हैं, भारत उन्हें लागू कर रहा है. लेकिन सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक संबंधों के अलावा अफगानिस्तान तक पहुंचने के लिए ईरान के सहयोग की जरूरत को देखते हुए वह ईरान पर अमेरिकी और यूरोपीय संघ की तरह पाबंदियां नहीं लगा रहा है."

रिपोर्ट में कहा गया है, "भारत ने पहली बार 2012 के अंत में ईरान पर पाबंदी लगाने का संकेत दिया, जब इसके केंद्रीय बैंक ने तेहरान की एक धार्मिक संस्था एशियन क्लीयरिंग यूनियन की जमा जब्त की."

इसमें यह भी कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव को देखते हुए भारत ईरान के मुद्दे पर और कड़ा रुख अपनाने की कोशिश कर रहा है और इसी वजह से वह ईरान के तेल पर निर्भरता कम कर रहा है. अमेरिकी रिपोर्ट में आंकड़ों का हवाला दिया गया है कि 2008 में भारत की कुल जरूरत का 16 फीसदी तेल ईरान से आता था, जो 2012 में घट कर सिर्फ 10 फीसदी रह गया.

ईरान पर अपनी ताजा रिपोर्ट में अमेरिकी कमेटी ने भारतीय तेल राज्यमंत्री आरपीएन सिंह का हवाला दिया है, "भारतीय रिफाइनरी को ईरानी कच्चे माल की जरूरत है लेकिन इसके बाद भी सिंह ने भारतीय संसद से मई 2012 में कहा कि चालू वित्तीय वर्ष के अंत तक भारत 11 प्रतिशत ईरानी आयात कम कर देगा." भारत का वित्त वर्ष अप्रैल से मार्च के दौरान चलता है.

Iran Öl

मुश्किल में ईरान का तेल उद्योग

इसके अलावा उस गैसलाइन का भी जिक्र है, जो पाकिस्तान के रास्ते ईरान से भारत आने वाली थी कि किस तरह भारत ने खुद को इससे अलग कर लिया है. भारत को इस गैसलाइन की सुरक्षा की चिंता है क्योंकि इसे पाकिस्तान से होकर गुजरना है. अगर ईरान पर से अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां हटती हैं, तो भारत दोबारा इस पर विचार कर सकता है.

रिपोर्ट में कहा गया, "जुलाई 2010 में ईरान और भारत ने एक उच्च स्तरीय बैठक में चर्चा की कि क्या इस गैस पाइपलाइन को पाकिस्तान के बाहर बाहर लाया जा सकता है लेकिन इस पर अनुमानित खर्च को ध्यान में रखते हुए फिलहाल इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है."

अमेरिकी कमेटी की रिपोर्ट का दावा है कि लगातार पाबंदियों से ईरान के अर्थव्यवस्था की कमर टूट चुकी है और वह परमाणु मसले पर समझौता करने की सोच रहा है, "ईरान के राजस्व का 70 फीसदी हिस्सा तेल के निर्यात से आता है. 2011 में ईरान हर रोज 25 लाख बैरल तेल निर्यात करता था जो घट कर आधा हो गया है. यूरोपीय संघ ने ईरानी तेल पर पाबंदी लगा दी है और यह एक बड़ी वजह है."

इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम ने भी ईरान के साथ काम करना बंद कर दिया है, जिससे उसकी मुद्रा की हालत लगातार खराब होती जा रही है. स्थिति इतनी खराब हुई कि लोगों ने प्रदर्शन किए, जिसके बाद ईरान सरकार ने मुद्रा पर नियंत्रण के लिए कुछ जरूरी कदम उठाए और गैरकानूनी तौर पर मुद्रा बदलने वालों को गिरफ्तार किया गया.

इसमें यह भी कहा गया है कि लगातार पाबंदियों की वजह से ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी धीमा पड़ गया है. हालांकि उन्होंने चेतावनी दी है कि ईरान कुछ दूसरे तरह के हथियार विकसित कर रहा है.

एजेए/ओएसजे (पीटीआई)

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