भारत और जर्मनी के बीच मजबूत कड़ी | फीडबैक | DW | 25.11.2014
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फीडबैक

भारत और जर्मनी के बीच मजबूत कड़ी

पाठकों से मिले फीडबैक में क्या लिखा है उन्होंने अपने संदेशों में, पढ़िए यहां...

भाषा कोई भी बुरी नही होती, चाहे वह संस्कृत हो या जर्मन, लेकिन कोई भाषा किसी पर लादना गलत है. सरकार चाहे तो उसे विद्यार्थी की इच्छा पर छोड़ सकती है वो चाहे जिस भाषा को चुने. यूनुस खान

मैं संस्कृत या हिन्दी के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन जर्मन भाषा हमारे बच्चों को उनके भविष्य में एक अच्छी नौकरी पाने के लिए कई विकल्प दे सकेगी. जर्मन एक बहुत महत्वपूर्ण भाषा है. अगर हमारी युवा पीढ़ी इसे स्कूलों में सीख लेती है तो उनके पास उच्च पढ़ाई के लिए जर्मनी, ऑस्ट्रिया या स्विट्जरलैंड जाने का एक और विकल्प होगा. यहां रहते हुए भी वे यूनिवर्सिटियों, कॉलेज में भाषा सीखाने का काम कर सकते हैं. ऐसे संस्थानों में काम कर सकते हैं जहां जर्मन भाषा की जरूरत हो सकती है. सीमंस जैसी कंपनियों के कॉल सेंटर में जर्मन विशेषज्ञों की जरूरत होती है या वे जर्मन गाइड के रूप में काम कर सकते हैं. पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय ऐसे युवाओं को ट्रेनिंग भी देते हैं जिससे वे अच्छा पैसा कमा सके. एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जर्मन संस्कृत से काफी मिलती जुलती है तो क्यों न हम जर्मन सीखे या अपने बच्चों को सीखने दे. मुनिंद्रा त्रिपाठी, वाराणसी

संस्कृत राष्ट्र का गौरव होने के साथ साथ विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है और कई भाषाओं की जननी भी. आप जर्मन भाषा को रखे लेकिन अनिवार्य तीसरी भाषा के तौर पर नहीं. सूरज सिंह

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कितने विश्वसनीय हैं धर्म के ठेकेदार - भारत जैसे देश में जिसकी आबादी सवा सौ करोड़ है, सरकारें सबका पेट नहीं भर पा रही. विकास की तिजोरी संपन्न और अमीर लोगों के लिए ही खुलती है, गरीबों के लिए यह आज भी सपना ही है. करोड़ों लोग अभी भी बेकारी, कंगाली और लाचारी से जूझ रहे हैं. किसी सरकारी सहायता स्थल पर सिवाय कागजी कार्यवाही के अलावा कुछ नहीं होता. भटकते भटकते उन्हें रामपाल जैसों के आश्रम और डेरे ही आखिरी मंजिल दिखाई देते हैं जिन लोगों को समाज में भूखे होने पर कोई रोटी का एक टुकड़ा न डालता हो, वहां रहने को जगह, सोने को बिस्तर और खाने को चावल, दाल और खीर मिल जाये, उनके लिए बाबा तो भगवान ही हुआ. किसी ने कहा है जब तक देश में विषमता है, आश्रम, डेरे और बाबा खत्म नहीं हो सकते. रमेश ठाणे

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मैं आपका बहुत पुराना श्रोता हूं. 1969 से आपसे जुड़ा हुआ हूं. इस बीच मुझे आपसे बहुत से पुरस्कार भी मिले हैं. मैंने आपकी वेबसाइट के बारे में अपने बहुत से मित्रों को बताया है और वे आपसे जुड़े हैं. हरीश चंद्र शर्मा, जिला अमरोहा, उत्तर प्रदेश

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आपके द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा विज्ञान कार्यक्रम मंथन अपने आप में एक अच्छा और ज्ञानप्रद शो है. आपके द्वारा जो जानकारी हिन्दी में दी जा रही है वो काबिले तारीफ है. आप अपने इस शो के द्वारा न सिर्फ जिज्ञासाओं का शमन कर रहे है बल्कि भारत और जर्मनी के बीच एक मजबूत कड़ी का काम भी कर रहे हैं. आपका यह शो सहस्त्रायु हो इस कामना के साथ. श्रीवास्तव परिवार, इंदौर

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ऊर्जा की पर्याप्त आपूर्ति एक देश या अर्थव्यवस्था के विकास के लिए सबसे बड़ी जरूरत हैं. यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम कुशलतापूर्वक ऊर्जा या बिजली का उपयोग शुरू करें. इसलिए हमें चाहिए कि जीवन में सुख खोए बिना बिजली को बचाए. "बिजली बचाने के 7 तरीके' को दर्शाते हुए तस्वीरों के मध्यम से तथ्यों की पेशकाश बहुत अच्छी लगी. जर्मन पुलिस अधिकारी आम तौर पर अपने हथियारों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते पर भी अच्छी जानकारी मिली. 'वर्चुअल वन' हालांकि एक वास्तविकता नहीं है, यह अपने स्वयं के कंप्यूटर में वन को लाता है. इससे हमें विभिन्न प्रकार के जंगलों और उनकी अद्भुत जैव विविधता देखने को मिली. कुछ दुर्लभ पौधों और जानवरों का भी पता चला जो इतनी आसानी से प्रकृति में नहीं मिलते है. 'मंथन' में 3-डी जंगल के बारे में वीडियो भी बहुत अच्छा लगा. सुभाष चक्रबर्ती, नई दिल्ली

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