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भारत, अमेरिका का न्यूक्लियर फ्यूल रिप्रोसेसिंग करार

भारत और अमेरिका ने परमाणु ईंधन की रिप्रोसेसिंग के समझौते पर दस्तखत किए. यूरोपीय देशों और जापान के बाद सिर्फ भारत के ही साथ अमेरिका ने यह समझौता किया है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कहा, वादे को मील के पत्थर की तरह निभाया.

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वॉशिंगटन में अमेरिकी विदेश उपमंत्री बिल बर्सं और भारतीय राजदूत मीरा शंकर ने समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के बाद भारत अमेरिका से मिलने वाले परमाणु ईंधन को अपने ही यहां फिर से संशोधित कर सकेगा. 2008 में भारत और अमेरिका के बीच परमाणु करार हुआ था. लेकिन रिप्रोसेसिंग के मसले पर दोनों देशों के बीच गतिरोध बना रहा.

अब यह बाधा पार हो गई है. परमाणु ईंधन को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, आईएईए के तहत एक अलग संयंत्र बनाना होगा. इस करार के साथ ही अब भारत के साथ अमेरिकी कंपनियों के लिए अब भारत के साथ परमाणु व्यापार शुरू करने के रास्ते खुल गए हैं.

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शुक्रवार को रिप्रोसेसिंग का करार करते वक्त कई अन्य योजनाएं भी स्पष्ट की गईं. अमेरिका गुजरात और आंध्र प्रदेश में दो परमाणु रिएक्टर लगाएगा. साझा रूप से जारी किए गए बयान में कहा गया, ''भारत के साथ बढ़े परमाणु व्यापार से हजारों नई नौकरियां पैदा होंगी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मदद मिलेगी. इससे भारत भी ऊर्जा की बढ़ती जरुरतों को पर्यावरण का ध्यान रखते हुए पूरा कर सकेगा.''

भारत और अमेरिका के बीच दो साल पहले असैन्य परमाणु करार हुआ था. उसके बाद भारत ने रूस और फ्रांस समेत कई अन्य देशों से भी इसी तरह का करार किया. रूस और फ्रांस के साथ करार होने के बाद भारत को परमाणु ईंधन मिलना शुरू भी हो गया और दोनों देशों की कई कंपनियों ने भारत में व्यापार भी पसार दिया. विश्लेषक कहते हैं कि भारतीय बाजार में रूस और फ्रांस की बढ़ती हिस्सेदारी ने अमेरिका पर दबाव बनाया और आखिरकार वॉशिंगटन को भारत को रिप्रोसेसिंग का अधिकार देना ही पड़ा.

रिपोर्ट: एजेंसियां/ओ सिंह

संपादन: एस गौड़