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दुनिया

भारतीय स्कूलों में जर्मन भाषा बचाने की कोशिश

भारत के 1000 स्कूलों में जर्मन भाषा कार्यक्रम अत्यंत सफल था, लेकिन जर्मनी के गोएथे इंस्टीट्यूट के साथ चलाए जा रहे इस कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है. जर्मन सरकार की कोशिश है कि यह कार्यक्रम आगे भी चलता रहे.

मातृभाषा, एक अन्य भारतीय भाषा और अंग्रेजी वाले फॉर्मूले पर चलने वाले भारतीय स्कूलों के लिए पहली विदेशी भाषा का कार्यक्रम अनूठा था. भारत सरकार ने जर्मनी के गोएथे इंस्टीट्यूट के सहयोग से केंद्रीय विद्यालय के 1000 स्कूलों में जर्मन भाषा पढ़ाने की शुरुआत की थी. यह पहल इतनी सफल रही है कि सितंबर में भारत के दौरे पर गए जर्मन विदेश मंत्री फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर ने नई दिल्ली में मस्जिद मोठ के स्कूल में छात्रों के साथ डेढ़ घंटे से ज्यादा का समय गुजारा.

इस कार्यक्रम के तहत भविष्य में करीब सवा लाख स्कूली छात्रों को जर्मन सिखाने की योजना थी. इस समय 500 स्कूलों में 78,000 बच्चे जर्मन सीख रहे हैं. इसके लिए गोएथे इंस्टीट्यूट ने 700 जर्मन शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया है. गोएथे इंस्टीट्यूट दुनिया भर में जर्मन भाषा के प्रचार प्रसार के लिए सक्रिय है और विदेशियों के लिए प्रौढ़ शिक्षा में भाषा पाठ्यक्रमों का आयोजन करता है. जर्मन सरकार ने इस कार्यक्रम के लिए 700,000 यूरो की मदद दी है.

श्टाइनमायर की यात्रा से पहले भारत सरकार ने इस कार्यक्रम को और तीन साल के लिए बढ़ाने का संकेत दिया था. लेकिन भारतीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा इस कार्यक्रम को नहीं बढ़ाने की घोषणा के बाद जर्मन विदेश मंत्रालय कोशिश कर रहा है कि कार्यक्रम जारी रहे. विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है, "हम बातचीत के बाद आश्वस्त हैं कि यह सफल कार्यक्रम आगे बढ़ाया जाएगा."

आधुनिक विदेशी भाषा के रूप में जर्मन भारत में लोकप्रिय हो रहा है और यह प्रोग्राम जर्मन भाषा को दुनिया भर में बढ़ावा देने के अलावा भारत के साथ आपसी संबंधों को गति देने के जर्मन सरकार के प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इस कार्यक्रम में जर्मन उद्योग की भी बहुत दिलचस्पी है ताकि वे तेजी से विकास करते भारत में कर्मचारियों की भर्ती कर सकें और वहां ज्यादा निवेश कर सकें. जर्मन विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन भाषा न जानने के कारण ज्यादा भारतीय छात्र दाखिला नहीं ले रहे.

जर्मन समाचार पत्रिका श्पीगेल के ऑनलाइन संस्करण के अनुसार जर्मन विदेश मंत्रालय भारत सरकार के फैसले से बहुत निराश है. अधिकारियों का कहना है कि यह परियोजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई सरकार की हिंदू राष्ट्रवादी नीति का शिकार हो गई है. बर्लिन की उम्मीद थी कि मोदी आर्थिक विकास को राष्ट्रीय सम्मान पर प्राथमिकता देंगे और विकास के लिए विदेशी भाषा का ज्ञान अपरिहार्य है.

एमजे/एमजी (डीपीए, स्पॉन)

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