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डीडब्ल्यू अड्डा

भारतीय शादियों जैसे हैं कॉमनवेल्थ गेम्स

कॉमनवेल्थ गेम्स की खबर हर मुंह में है, हर पन्ने पर है. ओलंपिक के बाद दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजन की जिम्मेदारी पाना और समय से उसे पूरा न कर पाना जर्मन मीडिया में भी खबरों में है.

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फ्रांकफुर्टर अलगेमाइने त्साइटुंग ने रिपोर्ट दी है कि निर्माण, सुरक्षा और साफ सफाई में गंभीर खामियों ने नई दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजकों को मुश्किल में डाल दिया है. अखबार लिखता है

भारत ने इतिहास के सर्वोत्तम खेल का वायदा किया था, लेकिन राजधानी में मेगा आयोजन के ठीक पहले गड़बड़ियों का सिलसिला समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा. कुछ एथलीटों ने नई दिल्ली की यात्रा या तो रद्द कर दी है या फिर वे यह देखने के लिए रुके हैं कि खामियों को दूर किया जाता है या नहीं. आतंक की आशंका भी फैली हुई है. खेल इस बीच भारत में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है. जमैका के फेनेल ने मंगलवार को खेल गांव में सफाई की खराब हालत की शिकायत की थी. मंगलवार को जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम को पार्किंग से जोड़ने वाला एक नया पुल गिर गया, जहां 3 अक्तूबर को उद्घाटन समारोह होगा. स्टेडियम में बुधवार को एक छत गिर गई.

बर्लिन से ही प्रकाशित टात्स ने लिखा है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के उद्घाटन से पहले इन दिनों सैकड़ों खिलाड़ियों को नई दिल्ली पहुंचना था, लेकिन प्रतिनिधिमंडलों और स्टारों के बदले पहुंच रही है उनके न आने की खबर.

" सब कुछ अच्छा रहेगा," भारत के विदेश मंत्री ने भरोसा दिलाया है. दूसरे भी सोचते हैं कि खेलों के साथ वैसा ही है जैसा आम भारतीय शादी में होता है. शोर भरा, अस्त व्यस्त और आखिरी घड़ी की तैयारी, लेकिन अंत में सब कुछ ठीक ठाक हो जाता है.

बर्लिन से प्रकाशित दैनिक टागेस्श्पीगेल ने लिखा है कि खेल गांव में गंदगी, टूटते पुलों और आतंकी हमले के डर से कॉमनवेल्थ गेम्स के विफल होने का खतरा है. अखबार कहता है

दिल्ली के बहुत से निवासी इस बीच सिर्फ यह चाहते हैं कि सारा तमाशा जल्दी समाप्त हो जाए. डेढ़ करोड़ आबादी वाले महानगर में उद्घाटन से ठीक पहले खेल का बुखार कहीं नहीं दिखाई देता. होटल वाले शिकायत कर रहे हैं कि उनकी उतनी भी बुकिंग नहीं हुई है जितनी आम तौर पर होती है. बहुत से लोग गेम्स के दौरान शहर से दूर रहना चाहते हैं.

लगभग हर आकलन में कहा जा रहा है कि 21वीं सदी के मध्य तक भारत चीन और अमेरिका के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा. आर्थिक दैनिक हांडेल्सब्लाट का कहना है कि आबादी में हो रही वृद्धि आर्थिक सत्ता भारत को चीन से बेहतर स्थिति में ला रही है. अखबार लिखता है

बीस साल में भारत संयुक्त राष्ट्र के आकलन के अनुसार दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होगा. भारत में काम करने वाली आयु का हिस्सा बढ़ेगा जबकि चीन में कम होगा. यहां भारत के लिए विकास का सबसे बड़ा अवसर है, लेकिन सबसे बड़ा जोखिम भी. क्योंकि आबादीजन्य लाभ आबादीजन्य दुःस्वप्न में भी बदल सकता है. शहरों में उभरते मध्यवर्ग की सफलता की कहानियों के विपरीत भारी गरीबी में रहने वाले 50 करोड़ लोग भी हैं, जो पूरे अफ्रीका से ज्यादा हैं. यदि सरकार को शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को दूर करने में सफलता मिलती है तभी भारत अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में कामगारों की अपनी क्षमता का उपयोग कर पाएगा. तभी समाजिक खाई बढ़ाने के बदले आर्थिक प्रगति का व्यापक असर होगा.

भारत के बाद अब पाकिस्तान, जहां बाढ़ से निबटने के मुद्दे पर राजनीतिज्ञों की आलोचना जारी है. बर्लिन से प्रकाशित दैनिक टात्स के साथ इंटरव्यू में पाकिस्तानी पत्रकार अहमद रशीद का कहना है कि बाढ़ के कारण पैदा हुई समस्याओं से निबटने में राजनीतिज्ञ दबाव में हैं, जिसका फायदा इस्लामी कट्टरपंथियों को मिल रहा है.

पाकिस्तानी गैर सरकारी संगठनों के लिए राहत सामग्रियां बांटने के लिए वालंटियर्स पाना बहुत मुश्किल है. लेकिन इस्लामी संगठनों के पास हजारों रंगरूट हैं जो कठिन चुनौती उठाने को तैयार हैं. उनके संगठन मुख्य रूप से पश्चिमोत्तर में सक्रिय हैं, जहां लड़ाई हो रही है. यह इलाका बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित था. इसलिए उन्हें और समर्थक मिलेंगे. कश्मीर में भी भूकंप के तुरंत बाद उन्होंने जल्द मदरसे खोल दिए थे. सरकारी स्कूल टूटे पड़े थे और मदरसे रंगरूटों की भर्ती का औजार बन गए.

नौए ज्युरिषर त्साइटुंग का कहना है कि बाढ़ आने के दो महीने बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने राहत सहायता के लिए 2 अरब डॉलर राशि देने की अपील की है, लेकिन दानकर्ता हिचकिचाहट दिखा रहे हैं.

कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के बाद बहुत सी सरकारें चंदा देने के मूड में नहीं हैं. साथ ही पाकिस्तान के मामले में राहत राशि के उपयोग पर उचित संदेह हैं. इसलिए अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने न्यूयॉर्क में पाकिस्तान से भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने और पुनर्निर्माण में व्यवस्था और पारदर्शिता दिखाने की अपील की है.

संकलन: आना लेमन/मझ

संपादन: वी कुमार

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