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दुनिया

भारतीय लोकतंत्र को अंदर से खतरा

पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका जैसे पड़ोसियों से घिरे भारत की छवि स्थिर देश की तरह है, जो पड़ोसी चीन के साथ दुनियावी शक्ति बनने जा रहा है. लेकिन पूरे राष्ट्र को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती है.

मई में छत्तीसगढ़ की रैली से लौट रहे नेताओं के काफिले को नक्सलियों ने घेर लिया. फिर चारों ओर से गोलीबारी शुरू हो गई. गाड़ियों में जो लोग सवार थे, उन्हें उतारा गया, नाम पता पूछा गया, फिर गोली मार दी गई.
विधायक महेंद्र कर्मा सहित 27 नेता मारे गए, दर्जनों घायल हो गए. वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल भी घायल हुए, जिन्होंने बाद में दम तोड़ दिया. नक्सलियों ने वैसी ही दहशत फैला दी, जैसी तीन साल पहले इसी राज्य में 70 से ज्यादा पुलिसवालों की हत्या करके फैलाई थी. क्या नक्सली भारतीय सुरक्षातंत्र के काबू से बाहर हो चुके हैं?
भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुताबिक नक्सलियों का बढ़ता प्रभाव "भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा" बन गया है. छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित भारत के नौ पूर्वी राज्यों पर इसकी गहरी पकड़ है. भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि 20,000 सशस्त्र और 50,000 दूसरे काडर नक्सली आंदोलन में शामिल हैं, जबकि गैरसरकारी संगठन इस संख्या को कई लाख बताता है, जिससे जुड़ी हिंसा में पिछले दो दशक में 10,000 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. यह ऐसा आंदोलन है, जो भारतीय लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता और समांतर शासन चलाना चाहता है.

Italien Korruption AugustaWestland

भ्रष्टाचार में फंसा देश


"लोक और तंत्र"
और सिर्फ नक्सली ही क्यों, कश्मीर और उत्तर पूर्व के अलगाववादियों ने भी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नाक में दम कर रखा है. दरअसल, भारत जाति और धर्म के संगम के लिहाज से पूरी दुनिया से अलग है. दूर से भले यह इसकी खूबसूरती दिखती हो लेकिन पास से देखा जाए तो मुश्किलों की जड़ भी है. आम भारतीयों से सवाल किया जाए, तो शायद 90 फीसदी से ज्यादा घरेलू समस्याओं के लिए धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं को जिम्मेदार मानेंगे. भारत के जाने माने समाजशास्त्री योगेंद्र यादव डॉयचे वेले से लोकतंत्र में "लोक और तंत्र" की दूरी बढ़ने पर जोर देते हुए कहते हैं, "अगर बैठ कर ब्लॉक स्तर पर कोई योजना बनाई जाएगी, तो वह इतनी मूर्खतापूर्ण नहीं हो सकती, जितनी की योजना आयोग की बनाई गई योजना है. और जनता के दुख दर्द से इतनी दूर नहीं हो सकती, जितना कि जयपुर और चेन्नई में बनने वाली योजना है."
थोड़ी सहानुभूति, थोड़ा डर और थोड़ी लालच, इन्हें मिला कर भारतीय नेता जाति और धर्म को भुनाना जानते हैं. किसी भी कीमत पर. सत्ताधारी कांग्रेस के महासचिव शकील अहमद ने हाल ही में राजनीतिक बयानबाजी में कह दिया कि "गुजरात दंगों की वजह से आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिदीन का उदय हुआ." आंतकवाद से जूझ रहे भारत में किसी आतंकवादी संगठन को "मजबूरी में पैदा हुआ" संगठन बताना गैर जिम्मेदाराना जरूर दिखाता है लेकिन खुद अहमद को पता है कि इससे उन्हें एक खास धर्म की सहानुभूति मिल सकती है.

Anna Hazare

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की मुहिम


भ्रष्टाचार का विष
कभी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से एक रुपया चलता है, जो गांव तक पहुंचते पहुंचते 10 पैसे रह जाता है. हाल में अगर तीन बड़े घोटालों यानी कॉमनवेल्थ, टूजी टेलीफोनी और कोयला घोटाले की बात करें, तो इनमें कई हजार अरब रुपये के वारे न्यारे हो चुके हैं. भ्रष्टाचार तो आम भारतीयों के लिए "रोजमर्रा" की बात हो चुकी है. भारत के पूर्व गृह सचिव मधुकर गुप्ता डॉयचे वेले से कहते हैं, "भ्रष्टाचार अगर सिर्फ ऊपरी स्तर पर हो, तो अलग बात है लेकिन यह लोगों की सोच में शामिल हो गया है कि अगर पैसा नहीं दिया जाएगा, तो काम नहीं होगा."

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