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ब्लॉग

भारतीय राजनीति में सफाई और सफाइयों का नया दौर

स्वच्छता और सेहत के बीच गहरे संबंध की बात जगजाहिर है. फिर भी महात्मा गांधी के बाद अब तक देश में कभी इसे प्रमुखता से नहीं उठाया गया. यूनिसेफ के आंकड़े बताते हैं कि आज भी देश की करीब आधी आबादी खुले में शौच जाती है.

एक अरब से भी ज्यादा आबादी वाले देश भारत में शौचालयों की कमी से निपटने के लिए नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2019 तक हर घर में टॉयलेट बनवाने का लक्ष्य रखा है. मगर कई विशेषज्ञों का मानना है कि केवल टॉयलेट बनाने भर से देश में गंदगी और सेहत से जुड़ी समस्याएं कम नहीं हो जाएंगी. लोगों में सफाई की आदत विकसित करने के लिए एक लंबे जागरुकता अभियान की भी जरूरत महसूस की जा रही है, जिसमें सरकारों, गैरसरकारी संगठनों, कॉर्पोरेट सेक्टर और आम लोगों सबकी भागीदारी हो. मगर समस्या यह है कि सफाई के मुद्दे को देश के लिए बेहद जरूरी मानने के बजाए लोग दलगत राजनीति के दलदल में घसीट रहे हैं.

मोदी का 'क्लीन इंडिया' अभियान

हाल ही में भारत की यात्रा पर पहुंचे फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'स्वच्छ भारत' अभियान की तारीफ की. इसके साथ साथ भारत सरकार को 'क्लीन इंडिया' के लिए एक मोबाइल ऐप तैयार करने में मदद का भी वादा किया. इसके पहले भी बिल गेट्स समेत कई विश्वस्तर पर सक्रिय कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियां देश में अचानक चर्चा में आए सफाई के मुद्दे पर खुशी से हाथ बंटाने का प्रस्ताव देती आ रही हैं.

महात्मा गांधी की 145वीं जयंती पर सफाई अभियान की शुरुआत करना एक बहुत सटीक मौका माना गया. सड़कों पर झाड़ू लगाने, टॉयलेट बनाने का प्रण लेने और मैला ढोने वालों की दुश्वारी को दूर करने के लिए पक्के कदम उठाने की बात करने से प्रधानमंत्री ने देश ही नहीं दुनिया भर में तालियां बटोरीं. वहीं कांग्रेस पार्टी के कुछ कार्यकर्ता इस बात पर ठगा सा महसूस करने लगे कि मोदी ने उनसे महात्मा गांधी के सफाई के एजेंडे को हथिया लिया है. इसीलिए इस अभियान में कांग्रेस की ओर से कोई जोश नहीं दिखा और इसे महज एक राजनीतिक पैंतरा मान कर दरकिनार करने की कोशिश हुई.

सफाई के समर्थन में थरूर को देनी पड़ी सफाई

कांग्रेस कार्यकर्ता और पूर्व यूएन राजदूत शशि थरूर को पार्टी ने अपने प्रवक्ता पैनल से हटा दिया है. थरूर का देश मे स्वच्छता अभियान शुरु होने पर सकारात्मक बयान देना कांग्रेस पार्टी में अनुशासन के उल्लंघन के तौर पर देखा गया. थरूर ने जून महीने में हफिंग्टन पोस्ट के लिए अपने एक लेख में भी मोदी के अच्छे प्रयासों को मान्यता देने की बात की थी. इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान थरूर कुछ अमेरिकी टीवी चैनलों पर इस यात्रा के बारे में विशेषज्ञ टिप्पणियां देते दिखे. कुल मिलाकर सफाई के मुद्दे पर सबके एकजुट होने की बात कह थरूर ने किसी तरह अपनी पार्टी की अनुशासन रेखा पार कर दी. इसका खामियाजा उन्हें पार्टी प्रवक्ता का पद छोड़कर चुकाना पड़ा है.

दलगत राजनीति से ऊपर रहे सफाई का मुद्दा

भारत जैसी पुरानी सभ्यता, समृद्ध संस्कृति और अब तेजी से उभरती आर्थिक ताकत वाला देश अगर आज भी सफाई के मामले में दूसरे विकासशील देशों से भी पीछे है तो इसका कारण कहीं ना कहीं लोगों का ढीला रवैया ही है. किसी राजनीतिक दल ने गंभीरता से इस समस्या को सुलझाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए. धर्म और जाति से जुड़े कुछ कारक भी कई बार खुले में शौच जाने की परंपरा के आगे बढ़ने का कारण बने. भारत की राजनीति में धार्मिक और जातिगत संवेदनाओं की गहरी छाप के कारण कोई भी नेता स्वास्थ्य और विकास के मुद्दों को इनके ऊपर रखने की कोशिश नहीं करता.

सफाई के लिए चौतरफा नीति जरूरी

स्वच्छता की कमी के कारण हर साल भारत में बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है. विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक मायनों में इसका नतीजा देश की कुल जीडीपी में करीब छह फीसदी के नुकसान के रुप में मिलता है. ऐसे में टॉयलेट बनाने से लेकर, कचरे के सही निपटारे, खाने और पानी के साफ और सुरक्षित स्रोतों तक स्वस्थ जीवनशैली के लिए जरूरी सभी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए कदम उठाने होंगे.

हाल ही में कई विदेशी कंपनियों ने भारत में नई इकोफ्रेंडली तकनीकों से लैस स्वास्थ्य और हाइजीन की सुविधाएं लाने और अरबों डॉलर के निवेश की इच्छा जताई है. सवाल उठना लाजमी है कि क्या देश के राजनीतिज्ञ मुनाफे के मूलभूत आदर्श पर काम करने वाली कंपनियों से भी ज्यादा संकुचित रुप से अपने निजी फायदे के बारे में सोचते हैं? देर से ही सही लेकिन अब जबकि सफाई का मुद्दा उठ ही गया है; तो क्या ये सामूहिक रूप से अपनी गलतियों को मान स्थिति को बेहतर बनाने के लिए मिलकर काम करने का नहीं है?

ब्लॉग: ऋतिका राय

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