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ब्लॉग

भारतीय मीडिया की परिपक्वता पर सवाल

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रमुख हो या विचाराधीन मामलों में मीडिया का संयम. निर्मल यादव का कहना है कि भारत में फटाफट खबर ब्रेक करने की अंधाधुंध होड़ ने प्रेस की परिपक्वता पर सवालिया निशान लगा दिया है.

मीडिया की खबरें न्यायाधीशों के फैसलों पर असर डालती हैं. निर्भया मामले में विवादास्पद डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण पर रोक हटाने की अपील पर सुनवाई में जज ने कहा कि खबरों से दबाव बनता है और फैसलों का रुख भी बदल जाता है. खासकर 24 घंटे प्रसारण करने वाले खबरिया चैनलों की आपाधापी ने समूचे मीडिया जगत को संकट में डाल दिया है और अब अदालतें भी अब इस पर उंगली उठाने लगी हैं. भारतीय मीडिया में खबरों को सनसनीखेज बनाकर बिकाउ माल की तरह बेचने की प्रवृत्ति बीते कुछ सालों में खूब पनपी है. खासकर नब्बे के दशक में जन्मे समाचार चैनलों में इस फितरत ने जमकर पैर पसारे. नतीजतन इसके असर से प्रिंट मीडिया भी आज अछूता नहीं है. इसका सबसे बड़ा नुकसान खबर की संवेदनशीलता खत्म होना और इसके बाजारु बनने पर मजबूर होने के तौर पर सामने आया है.
अब तक तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के शैशवकाल का हवाला देकर चैनलों में नाग नागिन और भूत प्रेत के नाम पर जमकर कमाई की गई. कालांतर में सेक्स और सेंशेसन की थूथू होने के बाद चैनल वालों ने कुछ हद तक इस प्रवृत्ति पर लगाम तो लगाई लेकिन अब इसकी जगह किसी भी मामूली बात को गैरजरुरी तरीके से बढ़ा चढ़ा कर पेश करने के तरीके ने ले ली है. लिहाजा प्रेस की परिपक्ता के लिए संभलने का भरपूर समय देने वालों के सब्र का बांध एक बार फिर टूटता नजर आ रहा है.
आलम यह है कि अब प्रेस की परिपक्वता पर न्यायपालिका भी सवाल कर रही है. इसका ताजा उदाहरण दिल्ली हाईकोर्ट ने पेश किया है जिसमें अदालत ने निर्भया बलात्कार कांड पर आधारित बीबीसी की डाक्यूमेंटरी के प्रदर्शन पर लगी रोक को हटाने से इंकार करते हुए अपने इस रुख के पीछे मीडिया को परोक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराया है. अदालत ने इस मामले में कोई अंतरिम आदेश देने से इंकार करते हुए कहा कि किसी भी संवेदनशील मामले की मीडिया कवरेज उसकी गंभीरता पर असर डालती है. अदालत का आशय साफ है कि मीडिया मामले की गंभीरता को समझे बिना ही उसकी गैरसंजीदा रिपोर्टिंग कर अर्थ का अनर्थ कर देता है.


अदालत के फैसलों, आदेशों सहित समूची अदालती कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग पर ही हाईकोर्ट ने सवाल उठाया है. बीबीसी की फिल्म के मामले में भी साफ है कि सरकार का प्रतिबंध आमराय के प्रतिकूल है. लेकिन इस मामले में भी मीडिया रिपोर्टिंग के कारण इस मुद्दे पर बहस अपने मूल विषय से ही भटक गई. अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रदत्त विचार अभिव्यक्ति के मूल अधिकार का सरासर उल्लंघन होने के बावजूद फिल्म पर प्रतिबंध हटाने पर कोई भी आदेश जारी करने से बचने के लिए विवश होना पड़ा.
अदालत के इस रुख के परिप्रेक्ष्य में यह सवाल भी उठता है कि क्या आने वाले समय में अदालतों में विचाराधीन मामलों की कवरेज पर भी नकेल डाली जा सकती है. यहां मुद्दा अब मीडिया ट्रायल की ओर उन्मुख हो जाता है. इस पर बहस की शुरुआत बाटला हाउस मुठभेड़ मामले में बीते दशक में हो गई थी. तब से लेकर तमाम घोटालों और सीएजी की रिपोर्ट सहित निर्भया केस जैसे अन्य प्रमुख अदालती मामलों में मीडिया ट्रायल ने अदालत की भौंह तिरछी कर दी है.

निर्भया मामले के बाद गठित जस्टिस उषा मेहरा आयोग ने भी अपनी सिफारिशों में मीडिया ट्रायल और गैरसंजीदा रिपोर्टिंग को रोकने की बात की थी. दरअसल भारत में मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर नियंत्रण या निगरानी का तंत्र बहुत कमजोर है. इसका फायदा टीआरपी के खेल में मुनाफाखोरी करने वाले मीडिया हाउस जमकर उठाते हैं. मजबूरन अदालतों को ना चाहते हुए भी माकूल आदेश देने से खुद को रोकना पड़ रहा है. इसका सीधा खामियाजा समाज और उन संवेदनशील मीडिया हाउस को भुगतना पड़ता है जो लोगों को खबर से बाखबर रखने की अपनी जिम्मेदारी से बेखबर नहीं हैं.

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