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दुनिया

भारतीय परमाणु बाजार पर चीनी नजर

भारत के परमाणु ऊर्जा बाजार पर नजर डालने वालों में अब चीन का नाम भी जुड़ रहा है. भारत समझता है कि अगर चीन से समझौता हो जाए, तो बिजली का उसका संकट ही खत्म हो जाए.

हो सकता है कि बीजिंग से न्यूक्लियर रिएक्टर खरीदने जैसे कदम में अभी बरसों लग जाएं, लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा है कि वे विकल्पों पर विचार करेंगे. इसका मतलब कि उनका देश अमेरिका, फ्रांस, रूस और कई दूसरे देशों की तरह भारत के परमाणु कारोबार के क्षेत्र में उतरने को तैयार है.

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के श्रीकांत कोंडापल्ली का कहना है, "मुझे लगता है कि चीनी व्यवासायिक कोण से देख रहे हैं क्योंकि भारत अगले 10-15 साल में 150 अरब डॉलर से ज्यादा के कॉन्ट्रैक्ट देने वाला है."

राष्ट्रपति जी का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब भारत के ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम खरीदने के प्रस्ताव पर हाल ही में मुहर लगी है. उससे कुछ ही दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भी परमाणु बिजली के मुद्दे पर बातचीत की है. भारत में फिलहाल सिर्फ तीन फीसदी बिजली परमाणु संयंत्रों में तैयार होती है. लेकिन आने वाले दिनों में यह बड़ी भूमिका निभा सकती है क्योंकि भारत की सवा अरब आबादी का एक चौथाई बिजली से दूर है.

Indien Kudankulam Atomkraftwerk Archiv 2012

परमाणु ऊर्जा पर ध्यान देता भारत

बिजली की भारी कमी

भारत के परमाणु बिजली कॉर्पोरेशन के मुताबिक वह छह जगहों पर कुल 20 छोटे रिएक्टर चलाता है, जहां 4,780 मेगावॉट बिजली बनती है. सरकार को उम्मीद है कि वह इसे बढ़ा कर 2032 तक 63,000 मेगावॉट कर सकती है. इसमें 85 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं.

चीन के साथ बातचीत से परमाणु शक्ति के रूप में भारत की स्वीकारोक्ति को और मदद मिलेगी. हालांकि नई दिल्ली ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं.

भारत ने 1998 में पोकरण में परमाणु परीक्षण किए थे, जिसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस पर पाबंदियां लगाई गई थीं. लेकिन 2008 में भारत ने अमेरिका के साथ परमाणु करार करके उन पाबंदियों को पीछे छोड़ दिया. अब लगभग दर्जन भर देशों के साथ परमाणु करार कर चुका है और फ्रांस, रूस और कजाकिस्तान जैसे देशों से यूरेनियम आने लगा है.

अमेरिका, भारत और चीन

भारत और चीन के कदम के बारे में ब्रुकिंग्स इंडिया के वरिष्ठ फेलो डब्ल्यूपीएस सिद्धू का कहना है, "यह भारत का एक तरीका है, जिससे वह दूसरे विकल्पों को तलाश सकता है."

वॉशिंगटन के साथ हुए समझौते के मुताबिक भारत अपने सैनिक कार्यक्रम को छोड़े बगैर परमाणु ईंधन और तकनीक आयात कर सकता है. इसे ध्यान में रखते हुए तोशीबा की अमेरिकी परमाणु इकाई वेस्टिंगहाउस गुजरात में एक परमाणु संयंत्र लगाने की योजना बना रही है.

अमेरिका के साथ किया गया परमाणु करार पाकिस्तान और चीन दोनों को नागवार गुजरा. चीन एशिया में परमाणु सुपर पावर के तौर पर देखा जाता है और अमेरिका के इस कदम को बीजिंग के खिलाफ समझा गया. पिछले साल चीन ने पाकिस्तान में दो परमाणु रिएक्टर बनाने के लिए 6.5 अरब डॉलर खर्च करने का फैसला किया. पाकिस्तानी अधिकारियों के अनुसार दोनों देश तीन और रिएक्टर बनाने पर बात कर रहे हैं.

एजेए/ओएसजे (रॉयटर्स)

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