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ब्लॉग

भारतीय नारी की परिभाषा बदलनी होगी

आर्थिक विकास में भारत दुनिया के दस बेहतरीन देशों में शामिल है, लेकिन यहां महिलाओं की स्थिति शर्मनाक है. मानसी गोपालकृष्णन का कहना है कि अगर विकास और समृद्धि को गंभीरता से लेना है, तो महिलाओं की हालत बेहतर करनी होगी.

भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यता में महिला की अहम भूमिका है. किसी भी खानदान में स्त्री उसकी संस्कृति की रखवाली करती है. अपने माता पिता के घर की संस्कृति वह पति के घर लेकर आती है, वहां की परंपरा में ढल कर फिर अपने नए आदर्शों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए संभालकर रखती है. भारतीय परंपरा में इसलिए नारी, सभ्यता और घर- गृहस्थी अकसर एक साथ एक आदर्श महिला की परिभाषा में समा जाते हैं.

दो शताब्दी के अंग्रेजी शासन के दौरान "भारतीय नारी" स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा परिभाषित हुई. अगर भारतीय समाज में पुरुष अंग्रेजी कानून, आदर्श और संस्कृति से जूझ रहे थे, तो उनकी माएं, बहनें और पत्नियां घर पर उनके पुराने आदर्शों को बचाए हुए थीं. 1947 में आजादी पाने तक भारतीय नारी और भारतीय गृहस्थी लगभग पर्यायवाची हो चुके थे.

लेकिन अब वक्त बदल गया है. 1990 के दशक में भारत में बाजार के खुलने के बाद बहुत लोगों को लगता है कि भारतीय संस्कृति खतरे का सामना कर रही है लेकिन इस नए समाज ने दलितों, गरीबों और समाज के कई दबे हुए तबकों को ऊपर उठने का मौका दिया है.

इन दबे तबकों में महिलाएं भी शामिल हैं, लेकिन अब आर्थिक ऐश्वर्य और पश्चिमी सभ्यता को दोषी बताकर भारतीय नारी की सदियों पुरानी छवि को बचाने की कोशिश की जा रही है. उनसे कहा जा रहा है कि छेड़ छाड़ और बलात्कार उनके "भड़कीले" कपड़ों की वजह से होता है, जींस या छोटी ड्रेस पहनने से होता है. अगर इस तर्क का विश्लेषण किया जाए तो यह बिलकुल बेतुका है.

वह इसलिए, क्योंकि किसी भी धार्मिक किताब में नहीं लिखा है कि भारतीय नारी को साड़ी पहनना होगा और बिंदी लगाना होगा और अगर वह जींस पहनेगी तो वह भारतीय नारी नहीं रहेगी, मनुस्मृति में भी नहीं. दूसरा, छेड़ छाड़ करने वाले और वह जो भारतीय संस्कृति के रक्षक होने का दावा करते हैं, वह खुद हमेशा धोती कुर्ता नहीं पहनते. बलात्कार के मामले में पकड़े जाने वाले लोग अकसर पैंट शर्ट में दिखते हैं. इसका मतलब, कि भारतीय संस्कृति का रक्षक होने के नाते हर महिला को पैंट पहनने वाले पुरुष पर झपटना चाहिए.

महिलाएं तो ऐसा नहीं करतीं, क्योंकि यह हमारी परंपरा नहीं है. लेकिन इस छेड़ छाड़ करने और सहने वाली परंपरा से और कुछ नहीं तो देश के विकास को नुकसान ही होगा. वह कैसे?

अगर महिलाओं पर संस्कृति बचाने और परिवार की देखभाल करने का इस तरह से बोझ डाला जाए, कि ऐसा न करने पर उन्हें हिंसा, बलात्कार या अपमान का सामना करना पड़े, तो इससे देश को नुकसान होगा. यह इसलिए, क्योंकि महिलाएं ले दे कर देश की जनसंख्या का 50 प्रतिशत हिस्सा हैं. वह बच्चों को जन्म देती हैं और पालती पोसती हैं. उनके मानसिक स्वास्थ्य का असर बच्चों पर पड़ता है. बच्चे समाज के नियमों का कैसे पालन करेंगे, यह उनकी मां पर निर्भर है. अगर किसी परिवार में सिर्फ पति भी काम करने जाए, तो उसे यह सुरक्षित करना होगा कि उसकी पत्नी संतुष्ट है क्योंकि वही उसके परिवार, उसके पालन पोषण की जिम्मेवार है.

आजकल शहरों में बहुत से पुरुष कामकाजी पत्नी चाहते हैं जिनसे वह अपने करियार के बारे में बात कर सकें और जिसने दुनिया देखी हो. आर्थिक संकट के दौरान अगर किसी एक व्यक्ति की नौकरी खतरे में हो तो परिवार फिर भी चल जाता है. परिवार में दो काम करने वाले हों तो पैसा भी ज्यादा होता है. ऐसे परिवारों में भारतीय संस्कृति खत्म नहीं होती. त्योहार यहां भी मनाए जाते हैं, माता पिता का ख्याल रखा जाता है और सब सुखी रहते हैं.

अंग्रेजों को भारत छोड़े अब लगभग 70 साल हो गए हैं. भारतीय संस्कृति को कोई खतरा नहीं है. खतरा है तो बस इसका, कि कुछ लोग समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूलकर उसे महिलाओं की भूल बताते हैं. भारतीय नारी की परिभाषा भारत की महिलाओं ने बदल दी है, स्वतंत्र, स्वायत्त होकर. अब बाकी भारत को भी ऐसा करना है.