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दुनिया

भारतीय दवाओं पर अमेरिका में रोक

भारतीय कंपनियों की कई दवाओं पर अमेरिका में प्रतिबंध लगा दिया गया है. क्या इसका यह मतलब है कि भारत में तैयार हो रही दवाएं अन्य विकसित देशों से आ रही दवाओं के मुकाबले खराब स्तर की हैं? या फिर इसके पीछे कोई और वजह है?

पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी खाद्य एवं ड्रग प्रशासन एफडीए ने भारत में तैयार हो रही कई दवाओं पर प्रतिबंध लगाया है. यह भारतीय कंपनियों के लिए चिंताजनक बात है. इसमें रैनबैक्सी और वोकहार्ट जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों की दवाएं भी शामिल हैं. जनवरी में एफडीए ने रैनबैक्सी के तोआंसा प्लांट में निर्मित सभी दवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया.

एफडीए के रिसर्च संस्थान सेंटर फॉर ड्रग इवैलुएशन एंड रिसर्च के कार्यकारी निदेशक कैरल बेनेट ने कहा, "हम घटिया क्वालिटी के उत्पादों को अमेरिकी ग्राहकों तक पहुंचने से रोकने के लिए तेजी से कदम उठा रहे हैं." उन्होंने बताया कि निरीक्षण कर पाया गया कि दवाओं के निर्माण में जिस तरह के सुरक्षा नियमों का पालन होना चाहिए वह नहीं हो रहा है. एफडीए का दावा है कि प्रारंभिक परीक्षणों में फेल हो जाने पर उनके स्टाफ ने इन दवाओं का फिर से टेस्ट किया. खुद अमेरिकी इस बात का खयाल रख रहे हैं कि वे भारतीय दवाओं के सेवन से बचें. अमेरिका में डॉक्टर भी इस बारे में सजग हैं और वे अपने मरीजों को भारत में बनी दवाएं न खरीदने की सलाह दे रहे हैं.

यूरोप को शिकायत नहीं

जर्मन सर्विस प्रोवाइडर कंपनी सोकरा टेक आर एंड डी के हेनिंग ब्लूम कहते हैं कि भारतीय दवाओं के साथ ऐसी कोई दिक्कत नहीं है. वह मानते हैं कि गड़बड़ियां कभी भी किसी के साथ भी हो सकती हैं. ब्लूम ने कहा, "दवाओं की गुणवत्ता को लेकर विभिन्न देशों में मानक लगभग एक जैसे ही हैं. अगर भारत में कोई कंपनी ऐसा कुछ करती है जिसे आप गलत पाते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि दूसरी कंपनी भी वैसे ही काम कर रही हैं."

भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि किसी एक मामले में ऐसा होने से सभी भारतीय कंपनियों के बारे में ऐसी राय रखना गलत है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सुरेश यादव कहते हैं, "कुछ कंपनियों में हुई इस तरह की घटनाओं का यह मतलब नहीं है कि भारत में निर्मित सभी दवाएं घटिया स्तर की हैं." उन्होंने बताया करीब 300 भारतीय कंपनियां ऐसी हैं जो बिना किसी शिकायत के ठीक वैसे ही मानक पर काम कर रही हैं जैसा कि अमेरिका चाहता है.

निर्माण का ब्योरा जरूरी

इंडियन ड्रग मैनुफैक्चरर्स एसोसिएशन के महासचिव दारा पटेल मानते हैं कि कंपनियां उत्पादन प्रक्रिया का ब्योरा जिस तरह देती हैं वह सही नहीं है. कंपनियों को इस मामले में सतर्कता बरतने की जरूरत है.

अंतरराष्ट्रीय मानकों को संतुष्ट करने के लिए जरूरी है कि कंपनियां दवाओं के निर्माण से संबंधित हर स्टेप लिखें. इस तरह की व्यवस्था दवाओं की गुणवत्ता निर्धारित करने के लिए ही बनाई गई है. डॉक्यूमेंटेशन एक बेहद जरूरी कदम है. अगर अधिकारियों को इसमें कोई भी कमी दिखती है तो वे दवा पर तुरंत प्रतिबंध लगा सकते हैं. ऐसा ही कुछ एफडीए ने रैनबैक्सी के तोआंसा प्लांट के साथ किया.

बड़ा बाजार

पटेल का मानना है कि भारतीय दवाओं पर प्रतिबंध के पीछे अमेरिका का कुछ और ही छुपा हुआ मकसद है. उन्होंने कहा, "एफडीए द्वारा लगाए गए बैन से कई और देशों को भी दिक्कतें हुई हैं लेकिन वे भारत का नाम ज्यादा इसलिए उछालते हैं क्योंकि भारत उनका बाजार खा रहा है."

दवाओं का बाजार अंतरराष्ट्रीय व्यापार है जिसमें भारत और चीन की पैठ है. विश्व स्वास्थ्य संगठन में दवाओं और अन्य स्वास्थ्य संबंधी तकनीकों का नियंत्रण करने वाले विभाग के प्रमुख लेंबिट रागो कहते हैं, "चिकित्सा संबंधी उत्पादों का 80 फीसदी निर्माण भारत और चीन में हो रहा है. यूरोप की चीन और भारत से आ रहे इन उत्पादों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है." ऐसा ही अमेरिका के मामले में भी है.

रागो कहते हैं कि हो सकता है अमेरिकी अधिकारियों को लगा हो कि ये उत्पाद उनके नियंत्रण से बाहर हैं इसलिए अपना नियंत्रण बढ़ाने के लिए उन्होंने भारत में निर्माण प्रणाली को लेकर सख्ती की हो. यानि पहले के मुकाबले अगर एफडीए अब ज्यादा दवाओं पर रोक लगा रहा है तो इसका सीधा सा मतलब यह नहीं कि दवाएं वाकई घटिया स्तर की हैं. यह अमेरिका का नियंत्रण बढ़ाने का तरीका भी हो सकता है.

रिपोर्ट: ब्रिगिटे ओस्टेराथ/एसएफ

संपादन: महेश झा

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