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दुनिया

भारतीय चुनावों में युवा चेहरों की उपेक्षा

पूरे देश में भले युवा राजनीति का शोर हो और देश की यूनिवर्सिटियों में सरकार के खिलाफ असंतोष के संकेत हों, पांच प्रांतों में हो रहे चुनावों में बीजेपी के अलावा शायद ही कोई पार्टी युवा चेहरों पर भरोसा कर रही है.

जयललिता

जयललिता

तमाम राजनीतिक दल राजनीति में नए चेहरों को तरजीह देने के लंबे-चौड़े वादे करते हैं, लेकिन जब वादों को अमली जामा पहनाने की बात आती है तो तमाम दल बनी-बनाई लीक पर चलते हुए बुजुर्गों पर ही दांव लगाना पसंद करती हैं. देश के पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में भी यही परंपरा कायम है. संसद और विधान सभाओं में महिलाओं के आरक्षण का मामला भी अधर में लटका है, लेकिन बर बार होने वाले चुनाव दिखाते हैं कि राजनीतिक पार्टियां महिलाओं की उम्मीदवारी बढ़ाने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही हैं.

बुजुर्गों पर दांव

जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां ज्यादातर बुजुर्ग चेहरे ही दांव पर लगे हैं. एकाध अपवादों को छोड़ दें तो इन राज्यों में भारतीय राजनीति के सबसे बुजुर्ग नेता ही या तो चुनाव लड़ रहे हैं या फिर सत्ता के दावेदार दल उनकी अगुवाई में ही ताल ठोक रहे हैं. दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में डीएमके अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि सबसे बुजुर्ग हैं. उनकी उम्र 90 साल से ज्यादा है लेकिन पार्टी की चुनावी कमान उनके हाथों में ही है. राजनीतिक हलकों में पहले माना जा रहा था कि वह अपने बेटे एमके स्टालिन को मुख्यमंत्री के दावेदार के तौर पर पेश करेंगे. बड़े बेटे एमके अलागिरी के पार्टी से बाहर होने के बाद स्टालिन के नेतृत्व को कोई चुनौती भी नहीं थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. राज्य में उनकी प्रतिद्वंद्वी सत्तारुढ़ अन्ना डीएमके की ओर से पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री जयललिता चुनाव की बागडोर संभाल रही हैं. उनकी उम्र 68 साल है.

तरुण गोगोई

तरुण गोगोई

तमिलनाडु के पड़ोसी पुड्डुचेरी में भी मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी ही अपनी पार्टी की कमान संभाले मैदान में हैं. उनकी उम्र भी 65 साल हो चुकी है. एक अन्य पड़ोसी राज्य केरल में कांग्रेस की कमान ओमन चांडी के हाथ में है. वह 72 साल के हैं. उनके मुकाबले सीपीएम ने मुख्यमंत्री पद के किसी नए दावेदार को सामने पेश नहीं किया है. सीपीएम की ओर से अगर पी विजयन को सामने किया जाता वह नया चेहरा बन सकते थे. लेकिन पार्टी के भीतर विजयन और वीएस अच्युतानंदन को लेकर खींचतान जारी है. अच्युतानंदन भी लगभग 92 साल के हो चुके हैं. लेकिन इस उम्र में भी वह चुनाव मैदान में उतरे हैं. विजयन भी मैदान में हैं. पूर्व वित्त मंत्री के.एम.मणि भी 83 की उम्र में एक बार फिर अपनी किस्मत आजमाने उतरे हैं. वह अपनी परंपरागत सीट पाला से 51 सालों से जीतते रहे हैं. राज्य में कांग्रेस व सीपीएम में अस्सी पार वाले उम्मीदवारों की भरमार है.

पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही अपनी पार्टी की स्टार प्रचारक हैं. पार्टी को दोबारा सत्ता में पहुंचाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर ही है. उनकी उम्र भी साठ पार हो चली है, लेकिन उनकी प्रतिद्वंद्वी सीपीएम की अगुवाई वाले लेफ्ट फ्रंट के पास भी युवा चेहरों का अकाल है. लेफ्ट की ओर से दो बुजुर्ग नेता अध्यक्ष विमान बसु और पूर्व मुख्यमंत्री ही चुनाव प्रचार की बागडोर संभाल रहे हैं. पड़ोसी असम में कांग्रेस ने तरुण गोगोई के हाथ में ही कमान सौंपी है। उनकी उम्र लगभग अस्सी साल है और वह बीते पंद्रह वर्षों से राज्य के मुख्यमंत्री है. अबकी राज्य में सत्ता की दावेदार बीजेपी ने सर्वानंद सोनोवाल के तौर पर एक नया चेहरा जरूर उतारा है. लेकिन असम की राजनीति को करीब से जानने वाले सोनोवाल को नया चेहरा नहीं मानते. वह नब्बे के दशक में राज्य के ताकतवर अखिल असम छात्र संघ (आसू) के अध्यक्ष रह चुके हैं.

ममता बनर्जी

ममता बनर्जी

वजह

आखिर राजनीति में अहम मौकों पर कोई भी पार्टी युवा चेहरों पर भरोसा करने का साहस क्यों नहीं दिखाती? इसका जवाब है कि कोई भी पार्टी किसी तरह का खतरा नहीं मोल लेना चाहती. इसलिए सब जमे-जमाए चेहरों पर ही भरोसा करते हैं. राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हिमांशु गोगोई कहते हैं, "राजनीतिक दलों की कथनी व करनी में भारी अंतर है. वह युवाओं को राजनीति में आगे लाने की बात तो करती हैं. लेकिन अहम मौकों पर उनका भरोसा डगमगा जाता है." गोगोई के मुताबिक यही वजह है कि तमाम चुनावों के मौके पर बुजुर्गों पर ही भरोसा जताया जाता है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दरअसल जीत की अदम्य इच्छा और हार का डर ही इन दलों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है. एक बार चुनाव जीतने के बावजूद कोई भी पार्टी नए चेहरों को आगे लाने का कोई खास प्रयास नहीं करती. नतीजतन अगले चुनावों में एक बार फिर पुराने चेहरों पर भरोसा जताने के अलावा उनके सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं होता.

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