भारतीय इंजीनियरों के सपने तोड़ती ट्रंप की नीतियां | दुनिया | DW | 13.03.2018
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दुनिया

भारतीय इंजीनियरों के सपने तोड़ती ट्रंप की नीतियां

अब तक भारतीय इंजीनियरों के लिए अमेरिका जाकर काम करना, पैसा कमाना आसान था लेकिन ट्रंप सरकार की नीतियों ने इनके अमेरिकी सपने को बुरी तरह प्रभावित किया है. विशेषज्ञों को डर है कि ये नीतियां कारोबारी माहौल पर असर डालेंगी.

रघु श्रीनिवासन ने अपनी पत्नी से वादा किया था कि वे इस बार अमेरिका से उनके लिए आइपैड तो बेटी के लिए ढेर सारी विदेशी चॉकलेट लाएंगे लेकिन, मां-बेटी का अपने तोहफो के लिए इंतजार खत्म ही नहीं हो रहा है. इसकी वजह यह है कि श्रीनिवासन का वीजा एक से अधिक बार नामंजूर हो चुका है. कुछ ऐसा ही हाल चेन्नई की अबीरामी सुंदर का है. अपनी नई-नई शादी के बाद अबिरामी को उम्मीद थी कि वह भी डिपेंडेंट वीजा लेकर पति के साथ अमेरिका चली जाएंगी लेकिन फिलहाल हालात यह है कि उनके पति को भी एच1बी वीजा नहीं मिल पा रहा है.

ये कोई इक्का-दुक्का मामले नहीं है बल्कि ऐसे कई लोगों की कहानी है जो स्वयं को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों से प्रभावित मान रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप की संरक्षणवादी नीति, "बॉय अमेरिका हायर अमेरिकन" ने इनकी उम्मीदों को बुरी तरह तोड़ दिया है.

दुनिया की सॉफ्टवेयर कंपनियां अब तक बड़े पैमाने पर भारत के आईटी सेक्टर को काम आउटसोर्स करती थीं जिसमें एच1बी वीजा भी अहम भूमिका निभाता था. एच1बी वीजा कुशल कामगारों को मिलने वाला एक खास तरह का वीजा होता है जो अब तक भारतीय आईटी इंजीनियर्स को आराम से मिल जाता था. लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इस एच1बी वीजा पर अब नीति काफी कड़ी कर दी है.

एच1बी वीजा की जटिल प्रक्रिया

एच1बी वीजा लेने की प्रक्रिया अब बेहद ही जटिल और पेचीदा हो गई है. आईटी उद्योग से जुड़े एक सूत्र ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि अब हर 10 से में 7 आवेदनों को कई तरह के सबूतों और कागजात के लिए भेजा जाता है.  पहले तकरीबन 90 फीसदी आवेदन सीधे स्वीकार कर लिए जाते थे. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सबूतों के लिए भेजे जाने वाले आवेदन रद्द ही कर दिए जाएं लेकिन इनमें समय बहुत लगता है. जो लोगों की अमेरिका जाने की संभावनाओं को अप्रत्यक्ष रूप से कम कर देते हैं.

इसके पहले फरवरी में अमेरिका की सिटीजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विस एजेंसी (यूएससीआईएस) ने कई कंपनियों को नोटिस भी जारी किया, एजेंसी के मुताबिक ये कंपनियां एच1बी वीजा का दुरुपयोग करने की कोशिश कर रहीं थीं. कुल मिलाकर 85 हजार एच1बी वीजा जारी किए जाते हैं, जो तीन साल के लिए वैध होते हैं. साथ ही इन्हें तीन साल के लिए बढ़ाया भी जा सकता है. यूएससीआईएस के पास 20 हजार वीजा आरक्षित भी होते हैं लेकिन, मांग हमेशा ही अधिक होती है जिसके चलते अब इनका चुनाव लॉट्री सिस्टम के जरिए किया जाता है.

कंपनियां तलाश रहीं विकल्प

वरिष्ठ आईटी प्रोफेशनल श्रीनिवासन बताते हैं कि अब अमेरिका जाने की संभावनाएं काफी कम होने लगी है. ट्रंप प्रशासन की सख्ती के चलते अब कई कंपनियां खुले तौर पर यह कह चुकी है वे अन्य वैश्विक प्रतिभाओं को तलाशने पर जोर देंगी. यह मामला सिर्फ एच1बी वीजा तक ही सीमित नहीं है. एक अन्य नॉन-इमीग्रेंट कैटेगरी में आने वाला एल1वीजा लेने में भी पेशेवरों को दिक्कतें महसूस हो रहीं है.

श्रीनिवासन की मानें तो अब टू-टियर कंपनियां, अमेरिकी कंपनियों के साथ कारोबारी संभावनाओं पर विचार करने लगीं है. ये कंपनियां अब पास की ऑफ-श्योर कंपनियों के साथ कारोबार करने में ज्यादा रुचि दिखा रहीं है. वहीं भारत सरकार बार-बार यह बताने पर जोर दे रही है कि भारतीय प्रतिभाएं अमेरिकी कंपनियों के लिए कितनी लाभदायक रहीं है साथ ही भारतीयों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अहम योगदान है. हालांकि अब भी कुछ विशेषज्ञों को उम्मीद है कि इस ट्रेंड का असर बड़ी भारतीय कंपनियों पर नहीं पड़ेगा, साथ ही वे छोटी कंपनियां बाजार से बाहर हो जाएगी जो इस एच1बी वीजा का गलत इस्तेमाल करती थीं.

कुशल कामगारों की आवाजाही

आईटी कंपनियों की कारोबारी संस्था नैसकॉम में ग्लोबल ट्रेड डेवलपमेंट के अध्यक्ष शिवेंद्र सिंह ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "हमें लगता है कि दबाव दोनों ओर से बढ़ा रहा है. प्रशासन और सरकार दोनों दोनों ही दबाव बना रहे हैं. पिछले साल मार्च में कई ऐसे विधायी आदेश मेरे सामने से गुजरे जिसमें बाय अमेरिका, हायर अमेरिकन की बात साफ तौर पर कही गई थी." हालांकि सिंह इसके लिए कुशल-अकुशल कामगारों में स्पष्ट अंतर न किए जाने को भी दोषी मानते हैं. वह यह भी कहते हैं कि एच1बी वीजा लेने को लेकर कागजी कार्रवाई और तमाम काम बढ़ा है जो भविष्य के लिए अच्छा नहीं है.

उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि हमारी कंपनियां कानूनों का पालन नहीं करती लेकिन इन नए नियमों ने नौकरशाही को बढ़ा दिया है लेकिन असल में कोई बदलाव नहीं आया है. सिंह सवाल करते है, "क्या ये सारी बातें उस वक्त भी सामने आएंगी जब कोई भारतीय कंपनी अमेरिका में स्थानीय स्तर पर बड़ी मात्रा में निवेश करें और करीब एक लाख स्थानीय कर्मचारियों को नियुक्त कर ले." उन्होंने कहा कि हमारी बस यही चिंता है और गुजारिश भी अगर इस ओर कुछ ठोस नहीं किया गया तो कारोबारी माहौल को धक्का लगेगा.

रिपोर्ट-वासुदेवन श्रीधरन

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