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ब्लॉग

भविष्य के लिए पैदा होती हैं आशंकाएं

सीबीआई के ताजा छापे के बाद दिल्ली और केंद्र सरकार भिड़ गए हैं. कुलदीप कुमार का कहना है कि सीबीआई जिस तरह सिर्फ विपक्ष को निशाने पर ले रही है, बीजेपी पर पक्षपात का आरोप लगने पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए.

केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी की सरकार और दिल्ली में शासन कर रही अरविंद केजरीवाल सरकार के बीच शुरू से ही तनावपूर्ण रिश्ते रहे हैं लेकिन केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के कार्यालय पर छापा मार कर उन्हें बेहद कटु बना दिया है. हालांकि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में दावा किया है कि इस छापे का केजरीवाल से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन केजरीवाल ने आरोप लगाया कि उनसे राजनीतिक ढंग से निपटने में विफल होने के बाद अब मोदी उनके दफ्तर पर छापे पड़वा रहे हैं. क्रुद्ध केजरीवाल ने तो ट्वीट करके मोदी को ‘कायर' और ‘मनोरोगी' तक बता डाला. केजरीवाल ही नहीं, अन्य विपक्षी पार्टियां भी इस छापे को ‘राजनीतिक बदले की कार्रवाई' के रूप में देख रही हैं और तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ' ब्राएन ने तो संसद में इस मुद्दे को उठाते हुए सीधे-सीधे यह आरोप लगाया है.

भारत में संघीय व्यवस्था है जहां राज्यों के अपने अधिकार हैं और केंद्र के अपने. केंद्र और राज्यों के बीच मधुर संबंध न रहने पर कोई भी काम सुचारु रूप से नहीं हो सकता. जाहिर है कि यह स्थिति देश के लिए अच्छी नहीं है. यदि किसी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं और सीबीआई उनकी जांच कर रही है, तो उसे उसके घर और दफ्तर पर छापे मारने का पूरा अधिकार है. लेकिन हर अधिकार की तरह ही इस अधिकार के साथ कुछ दायित्व भी जुड़ा है. क्या सीबीआई ने छापे मारने से पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को विश्वास में लिया? जाहिर है कि नहीं लिया, वरना केजरीवाल की इतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं होती. यूं भी सीबीआई की निष्पक्षता दागदार हो चुकी है और स्वयं सुप्रीम कोर्ट उसे ‘पिंजड़े में कैद तोता' बता चुका है जो अपने मालिक की बात को ही दुहराता रहता है. जब बीजेपी विपक्ष में थी, तो वह कांग्रेस पर सीबीआई का राजनीतिक दुरुपयोग करने का आरोप लगाया करती थी. लेकिन जब से वह सत्ता में आई है, उसने ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिया कि इस मामले में वह कांग्रेस से भिन्न है. इसके विपरीत सीबीआई जिस ढंग से काम कर रही है, वह खुल्लमखुल्ला पक्षपातपूर्ण है क्योंकि उसके निशाने पर केवल विपक्षी दलों के नेता ही हैं.

मध्य प्रदेश का व्यापमं घोटाला इतना बड़ा है कि उसकी पूरी तरह से जांच करने के लिए अधिकारियों की कमी पड़ रही है. उससे जुड़े अनेक व्यक्तियों की हत्या हो चुकी है. खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके परिजनों पर उसमें शामिल होने के आरोप लग चुके हैं. लेकिन सीबीआई ने उनके खिलाफ कोई भी कदम उठाने की जरूरत नहीं समझी. इसी तरह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर ललित मोदी कांड में गंभीर आरोप लगे, लेकिन सीबीआई ने उनसे पूछताछ करने की जरूरत तक नहीं समझी. लेकिन हिमाचल प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के घर पर छापा मारने के लिए सीबीआई ने ठीक वही दिन चुना जिस दिन उनकी बेटी का विवाह हो रहा था. अगर इस सब को नरेंद्र मोदी सरकार की ‘अपनों को लड्डू और गैरों को लात' की नीति की तरह देखा जा रहा है तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

अरविंद केजरीवाल का आरोप है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में अकेले अपने बूते पर सरकार बनाने का सपना देखने वाली बीजेपी केवल तीन सीटें पाकर करारी हार का सामना करने की सच्चाई को पचा नहीं पा रही है और उपराज्यपाल और पुलिस के जरिये दिल्ली सरकार के हर काम में रोड़ा अटका कर उसे विफल सिद्ध करने पर तुली हुई है. उनके इस आरोप में भी काफी हद तक सच्चाई है क्योंकि पहले कभी किसी उपराज्यपाल ने सरकार के हर निर्णय को पलटने का काम नहीं किया, लेकिन उपराज्यपाल नजीब जंग चाहते हैं कि हर फैसला उनकी अनुमति से हो. दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी के कई विधायकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उसने एक विधायक को एक दिन के लिए गिरफ्तार भी किया था लेकिन पिछली 5 दिसंबर को अदालत ने उसे निर्दोष करार दे दिया और पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि वह ऐसे झूठे केस न बनाया करे.

इन सब घटनाओं से भविष्य के प्रति कई तरह की आशंकाएं पैदा होती है. कुछ लोग तो अभी से देश में ‘अघोषित इमरजेंसी' लगी होने की बात करने लगे हैं. इसमें अतिरेक हो सकता है लेकिन सत्य का कुछ अंश अवश्य है. सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के नेता एवं कार्यकर्ता जिस निरंकुश ढंग से आचरण कर रहे हैं, उससे इस तरह की धारणा को बल ही मिलता है.

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