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मंथन

भविष्य का शहर बनाने में जुटा जर्मनी

गाड़ियां खुद से चल पड़ें. प्रदूषण न हो. घर के अंदर ही बिजली बन जाए. छत पर खेती हो. आखिर आने वाले कल के अच्छे शहर की तस्वीर तो ऐसी ही बनती है. लेकिन क्या ऐसा हो सकता है?

जर्मनी के श्टुटगार्ट शहर में ऐसा करने की योजना चल रही है. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट ऐसी ही परियोजना पर काम कर रहा है. वैज्ञानिकों की कोशिश है कि घर के अंदर ही जरूरत की बिजली बन जाया करे और शहर शांत और साफ सुथरे बने रहें. इस प्रोजेक्ट को देख रहे फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के रिसर्चर श्टेफेन ब्राउन उम्मीद जताते हैं, "घरों में रिएक्टर लगे होंगे. आप इन्हें घरों के सामने वाले हिस्से में लगा सकते हैं. यह रिएक्टर हाइड्रोजन को अलग करेंगे. यानि बायोकैटेलिस्ट पर धूप की किरणें पड़ेंगीं, बायोकैटेलिस्ट के बैक्टीरिया हाइड्रोजन पैदा करेंगे जिसे जमा किया जाएगा. बायो गैस को घर को गर्म करने और बिजली के लिए लगाया जा सकता है." यानि दो कमरे, शीशे वाली खिड़कियां, लकड़ी के दरवाजे, इन सब बातों का मतलब भविष्य के घर के लिए बदल जाएगा.

यातायात की समस्या

जाहिर सी बात है कि विज्ञान के आधुनिकीकरण के साथ यातायात भी बढ़ेगा और लोगों के सामने ज्यादा गाड़ियां आएंगी. घरों के सही इस्तेमाल की योजना है, ताकि यातायात के लिए ज्यादा जगह बनाई जा सके. भविष्य के शहरों में गाड़ियां हवा को साफ़ करेंगी और ऊर्जा का सही इस्तेमाल होगा. इंस्टीट्यूट को उम्मीद है कि यह आने वाले कल के लिए बहुत अच्छा संकेत है.

ब्राउन का कहना है कि छतों पर खेती बाड़ी की जा सकेगी. वहां बगीचे लगाए जा सकेंगे या फिर उनका इस्तेमाल गोदाम के तौर पर किया जा सकेगा, "अगर शहरों के घरों की सारी छतों को जोड़ा जाए तो उन पर लाखों वर्ग मीटर जगह होती है. आम तौर पर इसका इस्तेमाल सिर्फ हीटिंग या एयर कंडीशनर लगाने के लिए होता है. लेकिन शहरों में यहां खेती को भी शामिल करने की संभावना है. नए सिद्धांतों की मदद से तापमान को कैसे नियंत्रित कर सकता हूं या शहर में सप्लाई को बेहतर कर सकता हूं."

हालांकि अभी इसके परिकल्पना से निकल कर हकीकत तक आने में काफी वक्त लगेगा. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के प्रमुख विल्हेम ब्रावर का कहना है कि जीवनशैली बदलने की जरूरत है, "हम चाहते हैं कि भविष्य के शहरों में बेहतर जीवनशैली के लिए ये चीजें मुहैया हों. ऐसी चीजें, जो आराम से मिल जाएं और सस्ती मिलें."

रिपोर्टः के रुटकोवस्की, आर ओलिवियेरा/एजेए

संपादनः ईशा भाटिया

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