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दुनिया

भगदड़ ने फिर ली 108 की जान

मध्यप्रदेश के दतिया में रतनगढ़ मंदिर में दशहरा मनाने पहुंचे लोगों में मची भगदड़ ने करीब 108 लोगों की जान ले ली. मारे गए लोगों में अधिकतर महिलाएं और बच्चे हैं.

भगदड़ सिंध नदी पर बने पुल पर तब मची, जब अफवाह फैली कि पुल ढहने वाला है. जिला पुलिस प्रमुख सीएस सोलंकी ने डीपीए समाचार एजेंसी को बताया, "उन लोगों ने और मृतकों की खबर दी, जो घायल रिश्तेदारों को ले जा रहे थे. मृतकों में से 33, 14 साल के कम उम्र के बच्चे हैं."

उन्होंने बताया कि 108 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो गई है, तीन लोग लापता हैं. अधिकारी उन्हें भी मृत मान रहे हैं. जिस समय भगदड़ मची 500 मीटर लंबे पुल पर 25 हजार लोग थे. 100 घायलों में से 12 अस्पताल में हैं और उनकी हालत स्थिर बताई जाती है.

हालांकि प्रशासन ने लोगों के पुल से कूदने की खबरों का खंडन किया है लेकिन मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि कई लोगों ने जान बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी. भगदड़ में बचे एक व्यक्ति मनोज शर्मा के हवाले से एएफपी ने लिखा है, "लोग खुद को बचाने के लिए नदी में कूद रहे थे, वे लहरों के विपरीत तैर पा रहे थे. मैंने देखा कि लोगों ने बच्चों को भी पानी में फेंका है. मैंने देखा कि एक मां अपने बच्चे को भी़ड़ से बचाने की कैसे कोशिश कर रही थी. वो दोनों मेरी आंखों के सामने मारे गए."

राज्य के गृहमंत्री उमा शंकर गुप्ता ने कहा कि अभी तक भगदड़ के कारणों का पता नहीं चल पाया है. सुरक्षा की कमी का उन्होंने खंडन करते हुए कहा, "इस वार्षिक समारोह के लिए सुरक्षा के सभी इंतजाम किए गए हैं, हमारे पास अभी सूचना नहीं कि यह कैसे हुआ, क्योंकि हम बचाव कार्य में लगे हुए थे."

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मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मृतकों के परिजनों को डेढ़ लाख और घायलों को 50 हजार रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की है.

गुस्से से भरे श्रद्धालुओं ने आरोप लगाया कि पुलिस के लाठी चलाने के कारण भगदड़ मची और पुलिस भीड़ पर काबू नहीं कर पाई. 2006 में भी इसी पुल पर भगदड़ मची थी, उस समय 50 के करीब श्रद्धालु मारे गए थे.

भारत में धार्मिक समारोहों के दौरान कई बार भगदड़ हुई है. लेकिन उन्हें रोकने के उपाय कम ही हो पाए हैं. जोधपुर के चामुंडा मंदिर में 2008 में भीषण भगदड़ ने 220 लोगों की जान ली थी. इसके बाद वहां के मंदिर में आने और जाने के लिए रेलिंग लगा दी गई है. एक समय पर निश्चित संख्या में ही लोग आ जा सकते हैं. भारत में बने मंदिर पुराने हैं और गर्भगृह संकरे. आने जाने के रास्ते भी काफी संकरे हैं, लेकिन जनसंख्या बढ़ने के कारण श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ी है. लेकिन सुविधाएं उतनी मजबूत नहीं हो पाई हैं. बड़े आयोजनों में भीड़ नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी कोशिशों और शोध को भी भारत के धर्मस्थलों पर लागू करने की दिशा में प्रगति नहीं हुई है. इसी साल फरवरी में इलाहाबाद में कुंभ के दौरान हुई भगदड़ में भी 36 लोग मारे गए थे.

रिपोर्टः आभा मोंढे (डीपीए, एएफपी)

संपादनः महेश झा