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दुनिया

बढ़ रही है जर्मनी की आबादी

जर्मनी की आबादी बढ़ रही है, लेकिन देश का जन्मस्तर अब भी कम हो रहा है. तो आखिर जनसंख्या में इजाफा कैसे हो रहा है? ऐसी वजह है, जिसे लेकर चिंता जताई जा रही है.

आंकड़ों के अनुसार पिछले साल जर्मनी की आबादी 8.2 करोड़ रही, जबकि 2011 में यह 8.17 करोड़ थी. आबादी में तीन लाख की संख्या बढ़ी प्रवासियों की वजह से. वैसे तो हर साल दुनिया भर से सैकड़ों हजारों लोग नौकरी की तलाश में जर्मनी आते हैं, लेकिन 2012 में जर्मनी से विदेश जाने वाले लोगों की तुलना में तीन लाख ज्यादा लोग जर्मनी पहुंचे. अधिकतर लोग कोलोन और उसके आसपास आ कर बसते हैं या फिर फ्रैंकफर्ट और म्यूनिख जैसे बड़े शहरों में. इसीलिए शहरी आबादी बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में जनसंख्या में कोई फर्क नहीं देखा गया.

सोच में बदलाव

इनमें बड़ी संख्या दक्षिणी और पूर्वी यूरोप से आए लोगों की है. बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे देश ग्रीस, स्पेन और बुल्गारिया के लोगों के लिए जर्मनी में नौकरी की तलाश आखिरी उम्मीद जैसा है. लेकिन जर्मनी पहुंच कर जब उन्हें एहसास होता है कि यहां लोग उन्हें अपनाना नहीं चाहते तो वे काफी निराश हो जाते हैं.

बर्लिन इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन एंड डेवेलपमेंट के श्टेफान क्रोएनेर्ट का कहना है कि जर्मनी को देश में आ रहे लोगों का स्वागत करना सीखना होगा. उनका कहना है कि देश को काबिल लोगों की जरूरत है, "हमें उनकी प्रतिभा को पहचानना होगा, ऐसा करना होगा कि वे अपने परिवारों के साथ यहां रह सकें." क्रोएनेर्ट का कहना है कि केवल सिस्टम में ही बदलाव काफी नहीं, बल्कि सोच बदलना भी जरूरी है.

जर्मनी को फायदा

जर्मनी पहुंच रहे अधिकतर लोग या तो इंजीनियर हैं या शिक्षक. क्रोएनेर्ट कहते हैं कि जर्मनी को अपना दायरा बढ़ाना होगा, "जर्मनी को केवल इंजीनियरों की ही जरूरत नहीं है." वे कहते हैं कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी विदेशियों को नौकरियां दी जानी चाहिए.

जर्मनी में नौकरी के लिए भाषा जानना बेहद जरूरी है. जानकार मानते हैं कि अलग अलग नौकरियों के लिए अलग अलग तरह की भाषा की पढ़ाई की जरूरत है. जाहिर बात है कि डॉक्टरों को जिस तरह की शब्दावली की जरूरत है वैसी किसी रेस्तरां में काम करने वाले को नहीं.

किसका नुकसान?

क्रोएनेर्ट कहते हैं कि प्रवासी खास होते हैं क्योंकि वे किसी देश में आ कर अपना अलग समूह बनाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि वे देश की संस्कृति का हिस्सा बनने लगते हैं. विदेशियों के आने से जर्मनी को तो फायदा मिल ही रहा है, लेकिन जिन देशों से वे आ रहे हैं, उन्हें इसका नुकसान उठाना पड़ रहा है. ये विदेशी यहां काम करके जर्मनी की अर्थव्यवस्था की सहायता कर रहे हैं, लेकिन जिन देशों से ये आ रहे हैं वे तो पहले से ही बुरी अर्थव्यवस्था से जूझ रहे हैं.

दक्षिणी यूरोप के कई देशों में जन्मस्तर कम हो रहा है. लोगों के देश छोड़ देने से जनसंख्या और कम हो रही है. क्रोएनेर्ट का कहना है कि अभी भले ही देखने में ऐसा लगे कि स्पेन और ग्रीस जैसे देश जर्मनी के कारण बेरोजगारों से मुक्त हो रहे हैं, लेकिन आने वाले सालों में जब इन देशों को अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए इन लोगों की जरूरत होगी तब वे अपने देश में होंगे ही नहीं.

मंदी की मार

स्पेन की मिसाल देते हुए वह इसी का दूसरा पहलू भी समझाते हैं कि किस तरह से 2005 में वहां कई विदेशी नौकरियों की तलाश में पहुंचे, उन्हें निर्माण के काम में नौकरियां भी मिलीं, लेकिन जब देश के हालात खराब हुए तो सबसे पहले उन्हीं को देश छोड़ कर जाने को कहा गया, "जर्मनी को भी इसी बात का खतरा है. जब मंदी आएगी तो पहले गाज प्रवासियों पर ही गिरेगी."

क्रोएनेर्ट सरकार से मांग करते हैं कि कम से कम सामाजिक तौर पर प्रवासियों को देश में सुरक्षित महसूस कराया जाए और लोगों को समझाया जाए कि विदेशी यहां जर्मनी के फायदे के लिए ही आए हैं.

रिपोर्ट: मार्टिन कॉख/आईबी

संपादन: ए जमाल

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