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दुनिया

बढ़ता कारोबार, घटता स्तर

भारत में शिक्षा का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है. इसके बावजूद स्तर में लगातार गिरावट जारी है. इसकी वजह से इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्री लेकर निकलने वाले युवकों को भी रोजगार नहीं मिल रहा है. शिक्षाविद अलार्म बजा रहे हैं.

चालू वित्त वर्ष के दौरान शिक्षा के कारोबार के 7.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाने की उम्मीद है. बीते साल यह 6.4 लाख करोड़ था. इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च की ओर से हुए अध्ययन के बाद जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी शैक्षणिक संस्थानों के साथ बढ़ते सहयोग की वजह से इस क्षेत्र को विकसित होने में और सहायता मिलेगी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में कुल विश्वविद्यालयों में से 29 फीसदी निजी क्षेत्र में हैं जबकि वर्ष 2008-09 में यह महज तीन फीसदी था.

रिपोर्ट के मुताबिक कुछ निजी विश्वविद्यालयों ने बीते चार-पांच वर्षों में अपनी खास पहचान बनाई है. रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई गई है कि तेजी से खुलते नए संस्थानों की वजह से शिक्षकों व छात्रों के अनुपात की खाई भी तेजी से बढ़ रही है. छात्रों की तादाद के मुकाबले शिक्षकों की तादाद नहीं बढ़ रही है. इसके साथ ही प्रशिक्षित व कुशल शिक्षकों की भी भारी कमी है. इससे शिक्षा का स्तर प्रभावित हो रहा है. भारतीय शैक्षणिक संस्थानों की अंतरराष्ट्रीय रेटिंग से भी यह बात साबित होती है.

गिरता स्तर

देश में शिक्षा का स्तर तेजी से घट रहा है. हालत यह है कि इंजीनियिरिंग और एमबीए की डिग्री वाले ज्यादातर युवकों को भी नौकरी के लाले हैं. बीते दिनों व्यावसायिक संगठन एसोचैम की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि कुछ प्रमुख बिजनेस स्कूलों को छोड़ कर बाकी संस्थानों से निकलने वाले एमबीए डिग्रीधारकों को नौकरी नहीं मिल रही है. देश के लगभग साढ़े पांच हजार स्कूलों से हर साल निकलने वाले ऐसे युवकों में से महज सात फीसदी ही नौकरी के लायक हैं. इसी वजह से बीते साल देश के विभिन्न शहरों में 220 ऐसे स्कूल बंद हो गए. चालू वित्त वर्ष के दौरान और 120 बिजनेस स्कूलों पर बंदी की तलवार लटक रही है.

इंजीनियरिंग के मामले में भी यही स्थिति है. देश में हर साल 15 लाख इंजीनियर बनते हैं. लेकिन उनमें से आधे से ज्यादा को या तो नौकरी नहीं मिलती या फिर उनको बेहद मामूली वेतन पर काम करना पड़ता है. भारतीय तकनीकी संस्थान आईआईटी और कुछ अन्य संस्थान इस मामले में अपवाद हैं. शिक्षाविदों की राय में देश में कुकरमुत्ते की तरह उगते बिजनेस और इंजीनियरिंग कॉलेज इसकी प्रमुख वजह है. उनमें न तो आधारभूत सुविधाएं होती हैं और न ही कुशल शिक्षक. इससे वहां पढ़ाई-लिखाई ठीक से नहीं होती. इसी वजह से डिग्री लेकर कॉलेज से निकलने वाले ऐसे ज्यादातर युवकों के पास अपने पेशे से संबंधित मामूली ज्ञान भी नहीं होता. इन पर निगरानी के लिए कोई ठोस तंत्र नहीं होना इस स्थिति की सबसे बड़ी वजह है.

सुधार के उपाय

शिक्षाविदों का कहना है कि इस स्थिति को सुधारने के लिए केंद्र व संबंधित सरकारों को कुछ कड़े फैसले लेने होंगे. बिना पूरी पड़ताल के निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना की अनुमति दे दी जाती है. वहां मनमाने तरीके से भारी तादाद में छात्रों को दाखिला दे दिया जाता है. शिक्षाविद् सुनंद सान्याल कहते हैं, "इंजीनियरिंग व बिजनेस संस्थान आसान तरीके से मोटी कमाई का जरिया बन गए हैं. अपना कीमती समय और लाखों रुपये बर्बाद कर कॉलेज से बाहर निकलने वाले छात्रों का जब हकीकत से पाला पड़ता है तो उनके होश उड़ जाते हैं."

समाजशास्त्री सौमित्र कर्मकार कहते हैं, "अभिभावकों और समाज की मानसिकता भी इस अंधी दौड़ की एक प्रमुख वजह है. हर कोई अपने बच्चों को इंजीनियर बनाना चाहता है या फिर एमबीए की डिग्री दिलाना चाहता है. निजी संस्थान इसी मानसिकता का फायदा लूट रहे हैं." विशेषज्ञों की राय में सरकार को तो प्रभावी कदम उठाना ही होगा, समाज की मानसिकता भी बदलनी होगी. वरना शिक्षा महज एक कारोबार बन कर ही रह जाएगी.

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