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दुनिया

ब्रुनेई जा सकते हैं भारत के गोरखा जवान

दक्षिण पूर्वी एशिया के छोटे से देश ब्रुनेई में भारत अपने गोरखा जवान भेज सकता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत गिरने का असर तेल समृद्ध ब्रुनेई पर हुआ है. वह चीन और अन्य क्षेत्रीय ताकतों के बीच फंस सा गया है.

मलेशिया के पड़ोसी देश ब्रुनेई में 19वीं सदी के मध्य में तेल का पता चला. तब से ब्रिटेन और जापान के बीच ब्रुनेई को लेकर संघर्ष होने लगा. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सेना की निगरानी में ब्रुनेई की सरकार चुनी गई. 1959 में देश का नया संविधान बना, लेकिन देश की सुरक्षा और विदेश नीति ब्रिटेन की जिम्मेदारी में बनी रही. इसके बाद ब्रुनेई और ब्रिटेन के बीच संप्रभुता को लेकर बातचीत चलती रही. आखिरकार 1 जनवरी 1984 की मध्यरात्रि को ब्रुनेई आजाद हुआ.

आधे करोड़ से भी कम आबादी वाले ब्रुनेई ने इसके बाद तेजी से विकास किया. तेल संपदा के चलते 5,765 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला देश काफी आगे निकल गया. इस दौरान ब्रिटिश सेना की एक पोस्ट वहां बनी रहीं और वहां ब्रिटेन के गोरखा जवान तैनात रहे. लेकिन बीते दो दशकों से हालात बदल रहे हैं. ताकतवर हो चुके चीन और दक्षिण चीन सागर के विवाद की वजह से ब्रुनेई जैसे छोटे से देश को संकट का सामना करना पड़ रहा है. प्राकृतिक ईंधन से समृद्ध दक्षिण चीन सागर के अधिकार के लिए बीजिंग का फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई, ताइवान और मलेशिया से विवाद चल रहा है.

Prinz Charles Gurkhas

ब्रिटेन की रॉयल गोरखा बटालियन

ब्रुनेई सैन्य रूप से शक्तिशाली नहीं है. वहां आज भी ब्रिटेन की रॉयल गोरखा बटालियन की एक पोस्ट है, जहां 1,000 जवान तैनात रहते हैं. ब्रुनेई के सुल्तान इन जवानों की तैनाती के लिए ब्रिटेन को हर साल लाखों पाउंड चुकाते हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरने की वजह से ब्रुनेई की अर्थव्यवस्था की डगमगा रही है. सुल्तान चाहते हैं कि सैन्य खर्च को कम किया जाए.

फरवरी की शुरुआत में ब्रुनेई का एक प्रतिनिधि मंडल भारत आया. दोनों देश सहयोग के क्षेत्र तलाशना चाह रहे हैं. सैन्य सहयोग का विकल्प भी जांचा जा रहा है. भारतीय अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नई दिल्ली ने ब्रुनेई को अपनी सैन्य टुकड़ियां देने का प्रस्ताव दिया. सैन्य टुकड़ियों में भारत की गोरखा रेजीमेंट के जवान भी होंगे. अगर इस पर सहमति बनी तो भविष्य में ब्रिटिश टुकड़ी की ब्रुनेई से विदाई हो सकती है. ब्रिटिश अखबार द टेलीग्राफ के मुताबिक, अगर भारतीय गोरखा जवान ब्रुनेई पहुंचे तो ब्रिटेन के गोरखा जवानों की वहां से विदाई तय है. ब्रिटेन की गोरखा बटालियन से रिटायर हो चुके कई जवान ब्रुनेई की सेना में हैं. वे ऐसे जवान हैं जो ब्रिटेन नहीं लौटना चाहते थे.

भारत की "लुक ईस्ट पॉलिसी" पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों पर केंद्रित है. रणनीतिकार इसे चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश मानते हैं. नई दिल्ली ब्रुनेई से बड़ी मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस खरीदता है. ब्रुनेई के अलावा दक्षिण पूर्व एशिया में भारत के वियतनाम से भी घनिष्ठ संबंध हैं. वियतनाम के साथ नई दिल्ली दक्षिण तेल सागर में तेल और गैस की खोज कर रहा है. हनोई भारत के अंतरिक्ष अभियान का भी सहारा ले रहा है. भारत की वियतनाम और जापान से बढ़ती दोस्ती से चीन असहज होता रहा है. वहीं दूसरी तरफ चीन भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और श्रीलंका के साथ अपने रिश्तों को नई ऊंचाई ले जा रहा है. बीजिंग बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल को भी रिझाने की कोशिश कर रहा है.

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