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दुनिया

ब्राजील: डिल्मा चूकीं, मारीना ने चौंकाया

ब्राजील में राष्ट्रपति चुनाव में सत्ताधारी लेबर पार्टी की डिल्मा रूसेफ ने पहला चरण जीत लिया है. लोकप्रिय राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा की उम्मीदवार को 46.7 फीसदी मत मिले लेकिन वे पहले चरण में राष्ट्रपति चुने जाने से चूक गईं.

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अंतिम फैसला अब 31 अक्टूबर को होगा जब पहले दो नंबर पर आमे वाले उम्मीदवारों 62 वर्षीया रूसेफ और 68 वर्षीय सोशल डेमोक्रैट होजे सेरा का मुकाबला होगा, जिंहें पहले चरण में 32.6 फीसदी मत मिले. रूसेफ से स्पष्ट बहुमत छीन कर तहलका मचाने वाली रही पूर्व पर्यावरण मंत्री और ग्रीन उम्मीदवार मारीना सिल्वा जिन्हें 19.3 फीसदी मत मिले. राजधानी ब्राजीलिया में तो उन्होंने रूसेफ और सेरा को पीछे छोड़कर 42 फीसदी मत जीते.

राष्ट्रपति पद की अंतिम दौर में मारीना सिल्वा भले ही शामिल न हों, वे चुनावों की स्पष्ट विजेता हैं. 52 वर्षीयो सिल्वा ने जोशीला प्रचार किया और अंत तक अपना समर्थन दुहरा करने में सफल रहीं. ब्राजील में मारीना सिल्वा एक मिथक की करह हैं. श्रमिक परिवार में जन्मी और 16 साल की उम्र तक अनपढ़ रही सिल्वा ने खुद पढ़ाई की, नौकरानी के रूप में काम किया, विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और 1988 में मार डाले गए पर्यावरण कार्यकर्ता चीको मेंडेस के साथ संघर्ष किया. 1980 के दशक में लेबर पार्टी में शामिल हुई सिल्वा 1994 में सीनेटर बनी और 2003 में राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने उन्हें पर्यावरण मंत्री बनाया.

Dilma Rousseff und Marina Silva

रूसेफ और सिल्वा

वे राष्ट्रपति लूला और उनकी पार्टी को अंदर से जानती हैं जिसका लाभ उन्होंने चुनाव प्रचार में उठाया. 2008 में उन्होंने लूला की पर्यावरण नीति से निराश होकर पहले सरकार छोड़ी और फिर एक साल बाद पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया. उसके बाद से उन्होंने इस बात में कोई संदेह नहीं रहने दिया कि ब्राजील एक महिला राष्ट्रपति का चुनाव करने के लिए परिपक्व हो गया है. लेकिन उनका मतलब रूसेफ से नहीं था, जिनके साथ वे लूला सरकार में रहते हुए भी झगड़ चुकी हैं. अब उन्होंने रूसेफ को राष्ट्रपति बनने के लिए दूसरे चरण में जाने को मजबूर कर दिया.

डिल्मा रूसेफ को बस इंतजार करना होगा, उनकी जीत पक्की समझी जाती है. मारीना सिल्वा ने उन्हें बस थोड़ा सा झटका दिया है. बुल्गारिया में सबको पता है कि बुल्गारिया से आए आप्रवासियों की संतान डिल्मा लड़ सकती हैं. वे ब्राजील की सैनिक तानाशाही(1964-85) के खिलाफ लड़ने वाले छापामार संगठन की सदस्य थीं. 1970 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, यातना दी गई और दो साल तक कैद रखा गया. पिछले साल उन्हें कैंसर हो गया था, लेकिन कैंसर पर भी उन्होंने विजय पा ली.

दो बार तलाकशुदा और एक बेटी की मां डिल्मा ने बार बार कहा है कि वे देश में लूला दा सिल्वा की नीतियों को लागू करेंगी. चुनाव अभियान उन्होंने लोगों की चिंता करने वाली राष्ट्र माता की तस्वीर दी है. लेकिन वे लूला जैसी करिश्माई नेता नहीं हैं.

रिपोर्ट: एजेंसियां/महेश झा

संपादन: ए जमाल

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