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दुनिया

ब्रदरहुड पर कार्रवाई को मौन समर्थन

अरब नेताओं ने मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड पर चल रही कार्रवाई को मौन समर्थन दे रखा है. गुट के बढ़ते प्रभाव से नेताओं में घबराहट है क्योंकि अरब वसंत उनकी सत्ता को चुनौती दे रहा है. कम से कम जानकार तो यही मान रहे हैं.

मिस्र सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से 1952 से ही सेना के कब्जे में है. इस साल 3 जुलाई को लोकतांत्रिक तरीके से देश के राष्ट्रपति चुने गए ब्रदरहुड के मोहम्मद मुर्सी का तख्तापलट कर अंतरिम सरकार बना दी गई. मुर्सी के समर्थक काहिरा में शिविर लगा कर धरने पर बैठ गए और कहा जब तक मुर्सी की सत्ता में वापसी नहीं होती वो घर नहीं जाएंगे. सरकार ने उन्हें हटाने का आदेश दिया और थोड़ा इंतजार करने के बाद बुधवार को सेना के साथ पुलिस ने इन शिविरों पर धावा बोल दिया. राजधानी और आस पास के शहरों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई में अब तक 600 से ज्यादा लोगों के मरने की बात कही जा रही है.

इतना सब होने पर भी केवल कतर और ट्यूनीशिया ने ही इस घटना की कड़ी निंदा की है. इसमें भी ट्यूनीशिया की सत्ताधारी एन्नाहदा पार्टी ब्रदरहुड से जुड़ी हुई है जबकि कतर ब्रदरहुड के संरक्षकों में है. यूनिवर्सिटी ऑफ पेरिस जूड के प्रोफेसर खत्तार अबू दियाब का कहना है, "कतर और जॉर्डन को छोड़ खाड़ी की सभी राजशाहियों को डर है कि मुस्लिम ब्रदहहुड का आंदोलन उनके देश तक पहुंचेगा. इस कारण उन्हें मिस्र में पुराने दौर जैसी मजबूत सत्ता से ही उम्मीद है, मिस्र अरब जगत की धुरी है."

अबू दियाब ने बताया कि इन देशों में खासतौर से सउदी अरब ने, "तुर्की और ईरान के बढ़ते प्रभाव की ओर ध्यान दिलाते हुए उसे खारिज किया है... और मिस्र की सत्ता के लिए उनके समर्थन से अरब के असली क्षेत्रीय तंत्र की ओर वापसी की उनकी इच्छा का पता चलता है."

तुर्की की इस्लामी सरकार वैचारिक रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ी हुई है और अरब क्रांति के साथ ही उनका अरब जगत में प्रभाव बढ़ गया है. उधर ईरान ने सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद की सत्ता के साथ अपने संपर्कों को मजबूत कर लिया है और मिस्र में ब्रदरहुड के साथ संबंध जोड़ लिए हैं. ब्रुकिंग्स दोहा सेंटर में मध्य पूर्व के जानकार हामी शादी का कहना है कि मिस्र में जो कुछ हुआ, "वह बड़े क्षेत्रीय मुद्दों का नतीजा है जो अपनी तरह का एक अरब शीत युद्ध है और यह साफ है कि कौन सा पक्ष... जीत रहा है." हामी शादी के मुताबिक सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के लिए तख्तापलट ने उनके प्रमुख क्षेत्रीय विरोधी मुस्लिम ब्रदरहुड को झटका दिया है ऐसे में इस बात का कोई मतलब ही नहीं कि वो अपने रुख से पलट कर कहें, "हां, आप जो कर रहे हैं वो हमें पसंद नहीं. सऊदी अरब और यूएई इस नई सैन्य सरकार के प्राथमिक संरक्षक हैं और यह बहुत ध्यान रखते हैं. ऐसा नहीं होगा कि वो ज्यादा आलोचना करें."

तीन दशकों तक सऊदी अरब और ब्रदरहुड के बीच अच्छे रिश्ते बने रहे. 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान जब सऊदी अरब ने अमेरिकी सैनिकों को देश में स्वीकार किया और ब्रदरहुड ने इसकी आलोचना की तभी से उनके संबंध बिगड़ गए. अमेरिका पर 11 सितंबर के हमले के बाद मामला और खराब हो गया. उस वक्त सऊदी अरब ने ब्रदरहुड पर जिहादी विचारधारा की जड़ में होने का आरोप लगाया. 2002 में सऊदी अरब के गृह मंत्री ने एलान कर दिया, "सारे चरमपंथी गुट मुस्लिम ब्रदरहुड से निकले हैं." बात यहीं नहीं रुकी सुन्नी मुसलमानों वाले सऊदी अरब की नजर में सबसे बुरा यह हुआ कि ब्रदरहुड और शिया मुसलमानों के देश ईरान के बीच मेल मिलाप हो गया. ईरान मध्यपूर्व में सऊदी अरब का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है.

पेरिस के इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल साइंस में प्रोफेसर और इन मामलों के विशेषज्ञ स्टेफाने लेक्रोआ का कहना है, "मुस्लिम ब्रदहहुड कभी भी शिया ईरान से संबंध के विरोध में नहीं रहा जबकि सऊदी ने ना सिर्फ सुन्नी धर्मनिष्ठा की वजह से बल्कि क्षेत्रीय राजनीति की वजह से भी ईरान के लिए लाल रेखा खींच रखी है." लेक्रोआ ने यह भी कहा कि यूएई और सऊदी के लिए मुस्लिम ब्रदहहुड के कुछ क्षेत्रीय लक्ष्य भी हैं और वो खाड़ी की राजसत्ताओं के लिए खतरा हो सकते हैं. लेक्रोआ के मुताबिक, "यह राजसत्ताएं लोकतांत्रिक सरकारों की बजाय तानाशाही को अपने हित में मानती हैं जो उनकी नजरों में अस्थायी और अप्रत्याशित हैं."

एनआर/एएम (एएफपी)

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