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मनोरंजन

'बॉलीवुड' पसंद नहीं

सच्चाई से कोसों दूर, हल्के प्लॉट और नमकीन डायलॉग और ये सब गानों और डांस से घिरा हुआ. ना...बहुत कुछ बदल चुका है, भले ही आलोचक नाक भौंह सिकोड़ें.

महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन ने कान फिल्म फेस्टिवल में माना कि वह हिन्दी फिल्मों के लिए बॉलीवुड शब्द इस्तेमाल करना पसंद नहीं करते. "मुझे लगता है कि भारतीय फिल्म उद्योग की अपनी पहचान है. इसलिए मैं इसे भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ही कहूंगा. खासकर ऐसे समय जब हम इसकी स्थापना का 100वां साल इस वर्ष मना रहे हैं."

कान में अमिताभ बच्चन को बिग बी के नाम से ज्यादा जाना जाता है. कई निर्देशकों और अभिनेताओं की तरह उनका भी मानना है कि बॉलीवुड से बाहर भी भारतीय सिनेमा बहुत व्यापक है.

इन नए निर्देशकों और कलाकारों की दलील है कि पिछले 15 साल में भारत में काफी बदलाव हुए हैं साथ ही फिल्मों की कहानी उसे बनाने वाले लोग भी बदले हैं.

भारत में नई पीढ़ी के चार फिल्मकार कान फिल्म समारोह में रेड कार्पेट पर पहुंचे. उनकी फिल्म बॉम्बे टॉकीज कान में दिखाई गई. इस फिल्म के चार हिस्से चार अलग निर्देशकों ने बनाए हैं.

इस साल कान में भारत एक अतिथि देश है और यह ऐसा समय है जब देश में सिनेमा की सौंवी सालगिरह मनाई जा रही है.
दिबाकर बैनर्जी ने बताया, "कई निर्देशक थे जिन्होंने 2000 की शुरुआत में फिल्मों का निर्देशन शुरू किया उनमें से अधिकतर मुख्यधारा के सिनेमा में चले गए, बड़े सेट, बड़े कलाकार और कहानियां. उन्होंने इन फिल्मों को नया कोण दिया जो भारत के आज के समाज को दिखाता है."

Festival de Cannes 2013 Bombay Talkies

बॉम्बे टॉकीज का एक दृश्य

43 साल के दिबाकर बैनर्जी ने कहा, "आर्थिक विकास के कारण जो बदलाव आए उससे फिल्मकारों और कलाकारों की नई पीढ़ी तैयार हुई." उनकी फिल्म में एक थिएटर कलाकार की कहानी है जो कई साल बेकार रहने के बाद एक भूमिका में आता है. "ऐसे कई फिल्मकार थे जो फिल्मी दुनिया से नहीं, बाहर से थे. मेरे या अनुराग कश्यप जैसे, जो आए और अपारंपरिक विषयों या तरीके से कहानी बनाने लगे. दक्षिण में बदलाव ये आया कि उन्होंने बिलकुल नए तरह की स्क्रिप्ट, नई तरह की फिल्में बनानी शुरू कीं और बॉक्स ऑफिस रिकॉर्डों को तोड़ दिया. बॉलीवुड ने उनसे स्क्रिप्ट लेनी शुरू की."

वहीं बॉम्बे टॉकीज के दूसरे निर्देशक करण जौहर की शॉर्ट फिल्म एक समलैंगिक पुरुष के रिश्ते के बारे में हैं. ये यह भी दिखाता है कि कुछ निर्देशक नई कहानियों पर जोखिम लेने में नहीं हिचक रहे. करण जौहर ने बॉलीवुड को नाच गानों से भरपूर कई फिल्में दी हैं.

उनकी शॉर्ट फिल्म सिर्फ समलैंगिक रिश्ते पर ही नहीं बल्कि भारत में इसके बारे में बने हुए टैबू से भी संबंधित है. बैनर्जी ने कहा, वे पूरी तरह अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आ गए हैं और कहा जाए तो बिलकुल नया कुछ उन्होंने ट्राई किया है. इतना नया कि उनकी फिल्म भारत की सबसे विवादास्पद फिल्मों में एक हो गई है."

करण जौहर के शब्दों में, "मैंने ये चुनौती ली क्योंकि मैं जानता था कि अगर मैंने इस आयडिया पर कुछ नहीं किया तो मैं अपनी उपस्थिति साबित नहीं कर पाऊंगा. मुझे लगा कि यह मेरे लिए अहम है कि मैं ऐसा विषय लूं जिसके बारे में मैं जुनूनी हूं, एक कहानी जो मैं कहना चाहता हूं. इसे कहा जाना जरूरी था. सामान्य तौर पर लोग इस बारे में चुप ही रहते हैं. लेकिन ये गोल गोल कहानी नहीं, सीधे आपके सामने है ताकि सब देखें, सही या गलत ठहराएं, निर्भर करता है कि वो उसे कैसे देख रहे हैं."

करण जौहर का मानना है कि भारतीय समाज अभी भी समलैंगिकता को स्वीकार नहीं कर रहा और इसके प्रति उनके मन में भय भी है.

वहीं अनुराग कश्यप की कहानी एक लड़के के बारे में है जिसे उसके पिता ने भेजा है मुरब्बे के साथ ताकि वह अमिताभ बच्चन को पिता का बनाया मुरब्बा चखवाए.

जोया अख्तर की शॉर्ट फिल्म एक युवा लड़के के बारे में है जो डांसर बनना चाहता है लेकिन उसके पिता उसे फुटबॉलर बनाना चाहते हैं. अख्तर मानती हैं कि भारतीय फिल्में नए विषयों के लिए तैयार हो रही हैं. लेकिन वो ये भी मानती हैं कि पारंपरिक हिन्दी फिल्मों के लिए भारत में हमेशा जगह रहेगी. "भारतीय गाना पसंद करते हैं. हर मौके पर संगीत होता है. हमारी लोक कथाएं भी ऐसी ही थीं, उन सबमें संगीत था. यह हमारे कहानी कहने का हिस्सा है और यह खत्म नहीं होगा."

एएम/आईबी (एएफपी)

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