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ब्लॉग

बॉलीवुड के बायोपिक पर हावी बाजार

बॉलीवुड कहलाए जाने वाले हिन्दी के मुख्यधारा सिनेमा में इधर बायोपिक बनाने की होड़ लगी है. पर वास्तविक जीवन के सितारों की दास्तान दिखाने की कोशिशें किसी गंभीर सिनेमाई गतिविधि की जगह मुनाफे और मसाले के नाम ही रह जाती हैं.

कुछ छिटपुट कोशिशें बेशक इसी सिनेमा में होती हैं लेकिन विशाल उपभोक्ता आबादी वाला हिन्दी सिने संसार गंभीर कोशिशों को जरा कम ही तवज्जो देता है. उसे जीवन संघर्ष के तकलीफदेह शेड्स कुछ इस तरह देखने हैं कि पॉपकॉर्न खाते हुए आंसू निकल आएं और मौका पड़ने पर गले से सीटी भी. तालियां तो तैयार हैं ही. यानी तकलीफ को इतना पॉलिश्ड कर दो कि उसकी रगड़ उसका टेक्सचर उसकी बीहड़ता पर्दे पर अपनी मौलिक रोशनी में नहीं बल्कि पटकथा की चमक में गुजरे.

मुंबई में मारे गए मानवाधिकारों के जांबाज वकील शाहिद आजमी पर बनी फिल्म शाहिद रोंगटे खड़े कर देती है लेकिन वो बॉक्स ऑफिस पर भाग मिल्खा भाग जैसा धमाल नहीं मचा पाती. इस मामले में मिल्खा सिंह के बायोपिक की तुलना पान सिंह तोमर से करना भी लाजिमी होगा. इस हिम्मत की तो दाद देनी पड़ेगी कि फिल्म ने एक भूलेबिसरे से एक बेरौनक से नायक की याद दिलाई. कुछ मसाला करतब इस फिल्म में भी हैं लेकिन भाग मिल्खा भाग जैसा कमर्शियल रूपांतरण उन्होंने नहीं किया. इन फ़िल्मकारों का तर्क रहता है कि दर्शक के बीच फिल्म को हिट कराने के लिए कुछ फॉर्मूले तो गढ़ने ही पड़ते हैं. मिल्खा सिंह का किरदार निभाने वाले फरहान अख्तर ने अपनी काया को ऐसा छह और आठ पैक्स वाला किया कि देखकर भले ही बोले न हों लेकिन मिल्खा भी शर्माएं होंगे. हैरानी है कि वास्तविक जिंदगी के नायक पर फिल्म बनाते हुए वैसी ही जिंदगी को हूबहू उतारने का कौशल इन फिल्म निर्देशकों का कहां गया. क्या वो कौशल है ही नहीं या ये सोचीसमझी रणनीति है.

Filmplakat Mary Kom

अब इस कड़ी में सबसे ताजा फिल्म मेरी कॉम की चर्चा करें. मणिपुर की इस शानदार विश्व चैंपियन मुक्केबाज का किरदार प्रियंका चोपड़ा ने निभाया है. जाहिर है कमोबेश हर फ्रेम में रहना है तो आप कोई ढील नहीं बरत सकते. इस लिहाज से तो उन्होंने मेहनत की है. लेकिन अगर इस पूरी फिल्म को जरा भावुकता और तालियों और आंसू और सीटियों के मायाजाल से निकालकर देखें तो आप पाते हैं कि मेरी कॉम के संघर्ष का ये कैसा बॉलीवुडीकरण है. क्या हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि इस फिल्म के जरिए न सिर्फ एक महिला खिलाड़ी बल्कि एक भूगोल विशेष, जो कि इस मामले में पूर्वोत्तर है, वहां की सामाजिक राजनैतिक तकलीफों की निजात के लिए भी कोई रास्ता खुलेगा. क्या इस फिल्म के संघर्ष को हम मणिपुर की ही ईरोम शर्मिला के संघर्ष से जोड़ कर देख सकते हैं. क्या ईरोम शर्मिला का जीवन किसी बायोपिक के लिए उपयुक्त है. इस कठिन काम को करने का साहस हमारे इस बॉलीवुड में अगर है तो स्वागत योग्य बात है.

बायोपिक बनाते हुए बॉलीवुड में अति नाटकीयता, अति भावुकता, अति नायकत्व और भावनाओं का आंधी तूफान क्यों छा जाता है. क्या इसलिए कि बॉलीवुड अंततः मुनाफे के मुहावरे पर ही काम करता है. बायोपिक बनाने की शाबासी बोनस के रूप में. सिनेमा सिर्फ मुनाफे की खान तो नहीं हो सकता.

इसीलिए ये बात जब कही जाती है तो सही मालूम पड़ती है कि बॉलीवुड हमारे समकालीन इतिहास और समकालीन समाज के उदास दुर्बल लुटे पिटे लेकिन वैचारिक रूप से प्रखर नायकों की जिंदगियां हूबहू फिल्माने से परहेज करता है क्योंकि उसे बाजार और उपभोक्ता का डर रहता है. उसे आशंका रहती है कि ये फिल्म चलेगी या नहीं. आज के जानेमाने कलाकार भी ऐसी भूमिकाओ से जरा बचते फिरते हैं. क्या यही कारण है कि गांधी पर हमारे यहां एक भी मुकम्मल बायोपिक नहीं बन पाई है. गांधी के किरदार के लिए न तो एक्शन चाहिए न ही दमकता बदन. सीना तो ऐसा चाहिए मानो आत्मा में धंसा हुआ, वो कहां से लाएंगें. रिचर्ड एटनबरो ने गांधी को जिस नजरिये से देखा वही गांधी हमें नजर आते हैं. गांधी की आवाजाही कई हिन्दी फिल्मों में हुई है लेकिन वे बस आवाजाही जैसे ही रोल रहे हैं. इतिहास के दूसरे नायकों के साथ भी ऐसा ही हुआ है, चाहे वो अशोक हों या अकबर.

बेसिरपैर की कहानियों की जगह बायोपिक आएं तो अच्छी बात है. लेकिन इनमें नैतिक सदाशयता रहनी चाहिए. बायोपिक को जनता की कथित डिमांड के नाम पर ऊलजलूल मत करिये. ये मत कहिए कि लोग यही देखना चाहते हैं. उनकी रुचि में कुछ नया तो जोड़िए. सिनेमा सिर्फ ताली या सीटी बजाने या आंसू गिराने के लिए नहीं है. उसका बड़ा रोल है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादन: महेश झा

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