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विज्ञान

बैक्टीरिया पर नहीं होता एंटीबायोटिक का असर

अस्पताल में पाए जाने वाले रोगाणु घातक हो सकते हैं. बीमारी को फैलाने वाले बैक्टीरिया पर दवाएं असर नहीं करती. हर साल दसियों हजार लोगों की इसलिए मौत हो रही है कि बैक्टीरिया एंटीबायोटिक प्रतिरोधी हो गए हैं.

वीडियो देखें 04:15

ताकतवर बैक्टीरिया का तोड़

स्कॉटलैंड के बैक्टीरिया विशेषज्ञ अलेक्जांडर फ्लेमिंग ने सितंबर 1928 में पेंसिलिन की खोज की थी. यह आधुनिक चिकित्सा में मील का पत्थर था. बाद में इसकी वजह से पहली बार बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों का इलाज संभव हुआ. लेकिन इस बीच बैक्टीरिया प्रतिरोधी क्षमता विकसित करते जा रहे हैं. इसकी वजह जानवरों के चारे में और इंसान के इलाज में एंटीबायोटिक्स का बढ़ता इस्तेमाल है. अब अमेरिका और जर्मनी के वैज्ञानिकों को नई दवा मिली है जो खतरनाक बैक्टीरिया के खिलाफ इलाज में प्रभावी हो सकती है.

बॉन सथित फार्मा माइक्रोबायोलॉजी इंस्टीट्यूट की प्रोफेसर तान्या श्नाइडर बताती हैं कि एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया दुनिया भर में बढ़ रहे हैं, "इसका संबंध सिर्फ इंफेक्शन से होने वाली बीमारियों पर ही नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान के दूसरे पहलुओं से भी है. कीमोथैरेपी हो, ट्रांसप्लांट या इंप्लांट. यह सब एंटीबायोटिक के बिना संभव नहीं हैं."

धरती बनाती है एंटीबायोटिक

धरती में पाए जाने वाले बैक्टीरिया प्राकृतिक एंटीबायोटिक एजेंट पैदा करते हैं ताकि वे दूसरे बैक्टीरिया से लड़ सकें, उनसे अपनी सुरक्षा कर सकें. लेकिन अब तक जमीन में पाए जाने वाले 99 फीसदी बैक्टीरिया के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उन्हें प्रयोगशालाओं में पैदा नहीं किया जा सकता. फार्मा बायोलॉजी इंस्टीट्यूट के डॉक्टर टिल शेबैर्ले का कहना है, "शायद हम प्रयोगशाला में बैक्टीरिया पैदा करने के लिए सही वातावरण नहीं बना पा रहे हैं. मतलब यह कि पोषक तत्व उपलब्ध नहीं हैं और दूसरी चीजें भी वैसी नहीं हैं जैसी जमीन में होती है. इसलिए हम उन परिस्थितियों की नकल नहीं कर सकते जिससे बैक्टीरिया ब्रीड कर सकें."

लेकिन पहली बार अमेरिकी वैज्ञानिकों को अंजाने जमीनी बैक्टीरिया को प्राकृतिक परिस्थितियों में पैदा करने में कामयाबी मिली है. उन्होंने मल्टी चैंबर चिप विकसित किया है जिसमें जमीन में मिलने वाले बैक्टीरिया को अलग थलग कर दिया जाता है और फिर जमीन में बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाता है. उनकी कॉलोनी को बाद में प्रयोगशाला में आगे ब्रीड किया जा सकता है और उसके एंटीबायोटिक असर का परीक्षण किया जा सकता है.

टाइक्सोबैक्टीन का कमाल

जिन 10,000 बैक्टीरिया का टेस्ट किया गया उसमें से एक ऐसा मिला जो अत्यंत असरदार एंटीबायोटिक एजेंट का उत्पादन करता है, टाइक्सोबैक्टीन का. जर्मन शहर बॉन के मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया को रोकने वाले नए तत्व टाइक्सोबैक्टीन के असर करने के तरीके का पता कर लिया है. तान्या श्नाइडर बताती हैं, "टाइक्सोबैक्टीन बैक्टीरिया की कोशिकाओं के खोल पर एक साथ कई जगहों पर हमला करता है. यह लक्षित तरीके से कोशिकाओं की दीवार पर हमला करता है जिससे उनका निर्माण रुक जाता है. इस तरह यह खोल कमजोर हो जाता है और बैक्टीरिया की मौत हो जाती है."

बैक्टीरिया की कोशिकाएं सामान्य परिस्थिति में हर 20 मिनट पर बंट जाती हैं. शरीर बीमार करने वाले रोगाणुओं से भर जाता है. हर बार बंटने से पहले रोगाणु एक नई कोशिका दीवार बनाते हैं. बैक्टीरिया को टाइक्सोबैक्टिन देने से कोशिका की दीवार का बनना रुक जाता है. कोशिकाएं फट जाती है और मर जाती हैं. बीमारी का फैलना रुक जाता है. प्रयोगशाला में इस एंटीबायोटिक असर को माइक्रोस्कोप के नीचे अच्छी तरह देखा जा सकता है. टाइक्सोबैक्टीन के इलाज का तरीका एंटीबायोटिक के शोध में नया मोड़ है. लेकिन इंसान पर उसके असर और सहनशीलता के सबूत मिलने अभी बाकी हैं.

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