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दुनिया

बेरोजगारी का आईना बनी चपरासी की नौकरी

यूपी को सरकारी विज्ञापनों में कभी देश का उत्तम प्रदेश होने का दावा किया जाता था. लेकिन वहां चपरासी के पद पर भर्ती के लिए निकले सरकारी विज्ञापन के जवाब में मिले आवेदनों ने राज्य में सुशासन और बेरोजगारी की कलई खोल दी है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस सप्ताह 368 पदों पर चपरासियों की भर्ती के लिए विज्ञापन छपवाया था. लेकिन उसके जवाब में मिलने वाले आवेदनों ने सरकारी अधिकारियों के होश उड़ा दिए हैं. इन पदों के लिए कोई 23 लाख आवेदन मिले हैं. लेकिन इससे भी हैरत वाली बात यह है कि इनमें ढाई सौ पीएचडी धारकों के अलावा भारी तादाद में इंजीनयिर व पोस्टग्रेजुएट की डिग्री वाले उम्मीदवार भी शामिल हैं. यह कहना ज्यादा सही होगा कि चपरासी की यह नौकरी राज्य में बेरोजगारी की स्थिति का आईना बन गई है.

यह तो पहले से ही साफ था कि शिक्षा के स्तर, रोजगार और विकास के मामले में उत्तर प्रदेश की हालत भी पड़ोसी बिहार जैसी ही बदतर है. सत्ता में आने के बाद नेताओं का बैंक बैलेंश तो लगातार बढ़ता रहता है, लेकिन सरकार चाहे किसी की भी राज्य की हालत बद से बदतर की ओर बढ़ जाती है. बीते विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी (सपा) की भारी जीत के बाद राज्य की कमान जब अखिलेश सिंह जैसे युवा मुख्यमंत्री के हाथों में सौंपी गई थी तो खासकर युवा तबके में उम्मीद की हल्की किरण कौंधी थी. उसे लगा था कि एक युवा मुख्यमंत्री शायद बेरोजगारी का दर्द समझ कर उस दिशा में ठोस पहल करेगा. लेकिन हुआ उसका उल्टा ही. अखिलेश सरकार के दौरान भी हालात बदतर ही हुए हैं. एक ओर जहां शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है, वहीं दूसरी ओर यादव सिंह जैसे एक इंजीनियर के पास से सैकड़ों करोड़ की संपत्ति का बरामद होना और उसे सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं का संरक्षण हासिल होना विकास की अपनी कहानी खुद कहता है.

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भारत के पिछड़े राज्यों में हैं यूपी

कुछ महीने पहले बिहार में बोर्ड की परीक्षा के दौरान नकल कराने वाले अभिभावकों की एक तस्वीर ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं. उत्तर प्रदेश की तस्वीर भी उससे अलग नहीं है. दरअसल, बीते कोई दो दशकों से शुरू हुई जातीय राजनीति ने इस राज्य का कबाड़ा कर दिया है. इन राज्यों में अब राजनीति ही रातों रात करोड़पति बनने का शार्टकट है. नतीजतन छात्र पढ़ाई-लिखाई में फिसड्डी साबित हो रहे हैं. राज्य में एक के बाद सत्ता में आने वाली सपा या बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकारों ने राज्य के विकास की बजाय निजी हितों को साधने पर ज्यादा ध्यान दिया. इन राज्यों में छात्रों की शिक्षा का स्तर इस कदर गिर गया है कि उनको प्रतियोगी परीक्षाओं में कामयाबी नहीं मिलती. अस्सी के दशक तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय को प्रशासनिक परीक्षाओं की फैक्टरी कहा जाता था. हर साल वहां से दर्जनों लोग आईएएस बनते थे. लेकिन उस विश्वविद्यालय को भी राजनीति ने अपनी चपेट में ले लिया. यही वजह है कि राज्य से पीएचडी और इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले छात्र पांच हजार रुपये की नौकरी के लिए मोहताज हैं.

ताजा मामले में चपरासी के जिस पद पर भर्ती होनी है उसकी योग्यता तो महज पांचवीं पास है, लेकिन वेतन सोलह हजार रुपये है. यही वजह है कि बेरोजगारी से जूझ रहे तमाम डिग्रीधारी मधुमक्खी की तरह उस पर टूट पड़े हैं. सरकारी अधिकारियों की मानें तो महज इंटरव्यू के आधार पर होने वाली इस नियुक्ति में चार साल का समय लग सकता है. तब तक तो बेरोजगारों की एक नई जमात तैयार हो जाएगी.

उत्तर प्रदेश की यह तस्वीर एक भयावह संकेत है. येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने और फिर उस पर पकड़ बनाए रखने की कोशिशों में जुटे राजनीतिक दलों के लिए भी यह खतरे की घंटी है. लेकिन सवाल यह है कि क्या वह इससे सबक लेकर तस्वीर का रुख बदलने की दिशा में कोई ठोस पहल करेंगे? अब तक मिलने वाले संकेत तो नकारात्मक ही हैं.

ब्लॉग: प्रभाकर

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