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ब्लॉग

'बेआबरू होकर, अपने कूचे वो निकले'

एक कहानीकार ने लिखा कि जब मौत आती है तो मुल्क या शहर नहीं, बल्कि अपना घर और मुहल्ला याद आता है. लेकिन पाकिस्तान से भारत आए हिन्दू परिवार तो अपना सब कुछ पीछे छोड़ आए हैं. वो कभी पाकिस्तान नहीं लौटना चाहते.

"उतार आए मुरव्वत और रवादारी का हर चोला, जो एक साधु ने पहनाई थी माला, वो छोड़ आये हैं..
दुआ के फूल पंडित जी जहां तकसीम करते थे, गली के मोड़ पर हम वो शिवाला छोड़ आये हैं."


उर्दू के शायर मुनव्वर राणा के ये शब्द कराची का सैदाबाद हो या हैदराबाद का लतीफाबाद, पाकिस्तान के हर गांव गली में मुहाजिरों के 65 साल पुराने दर्द को बयां करते हैं. लेकिन इन दिनों सरहद के इस पार, दिल्ली का गांव बिजवासन मुहाजिरनामे के हर शब्द को सही साबित कर रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि सरहद के उस पार किसी युसूफ को, यहां उसकी जुलेखा के छूट जाने की टीस थी, वहीं बिजवासन में इन दिनों पांच साल की दिव्या को पाकिस्तान में ही रह गए गली के दोस्त रहमान से बिछड़ने का गम है.


बात जब अपनी सरजमीं की हो तो जाति और मजहब, सब के सब पीछे चले जाते हैं. भली लगती हैं सिर्फ वो मिट्टी, जिसमें पैदा हुए, पले और बड़े हुए. लेकिन कहते हैं कि जान है तो जहान है, और इसी जान की खातिर आज पाकिस्तान से आए सैकड़ों हिन्दू परिवार अपना काम धंधा और घर बार सब कुछ छोड़ कर भारत में बेहतर जिन्दगी की आस में जद्दोजेहद कर रहे हैं. बिजवासन की अम्बेडकर कोलोनी में डेरा डाले ये वही 480 पाकिस्तानी हिन्दू हैं जो हाल ही में खत्म हुए कुम्भ मेले में शिरकत करने के लिए तीर्थयात्रा वीसा पर भारत आये थे. बीते 8 अप्रैल को इनके वीजा की अवधि समाप्त हो गई. अब ये लोग जिन्दगी की खातिर अपना सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हैं लेकिन पाकिस्तान को मौत का मुंह बताते हुए ये वापस वहां का रुख करने को राजी नहीं है.

Pakistan Hindu Minderheit

दिल्ली में ठहरे पाकिस्तानी हिन्दू


पाकिस्तानी हिन्दुओं के भारत आने का यह पहला वाकया नहीं है. सन 1990 के बाद से अब तक लगभग 20 हजार हिन्दू भारत आये और फिर यहीं के होकर रह गए. पाकिस्तान में काफिर की नजर से देखे जाने वाले ये हिन्दू परिवार किसी न किसी बहाने से भारत आकर या तो शरणार्थी का दर्जा पाने या फिर नागरिकता देने की मांग करते हैं. इनमें से करीब 13 हजार पाकिस्तानी हिन्दुओं को भारत सरकार साल 2004-05 में नागरिकता दे चुकी है. लगभग 7 हजार हिन्दू पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान छोड़ कर भारत में आ बसे हैं. राजस्थान बॉर्डर से भारत आये ये लोग अब बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर, श्रीगंगानगर और जोधपुर में प्रवासी के तौर पर रह रहे हैं.


ताजा मामला 480 लोगों का है और इस बार इनकी इस लड़ाई में साथ दे रहे हैं एक रिटायर्ड फौजी अफसर नाहर सिंह. नाहर सिंह ने बिजवासन में 35 कमरों के अपने स्कूल की इमारत को खाली कर इन बेसहारा लोगों को आसरा देकर जो पहल की है वह धीरे धीरे कारगर होती दिख रही है.


सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी नजरिए से यह पहल खासी अहमियत रखती है. सामाजिक अहमियत के लिहाज से देखा जाए तो पाकिस्तान में हिन्दुओं की धार्मिक पहचान पर मंडराते संकट से निपटने के लिए भारत सरकार के पास इन लोगों को शरण देने के अलावा दूसरा कोई अन्य विकल्प नहीं है. खासकर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की हकीकत को देखते हुए भारत सरकार के लिए महज हिन्दू होने के नाम पर पाकिस्तानी नागरिकों को शरण देने का फैसला बेहद चुनौती भरा है. अधिकारियों की दलील है कि महज हिन्दू तुष्टिकरण के नाम पर पाकिस्तानी नागरिकों को शरण देना जोखिम भरा काम है. इस बात की गारंटी कौन लेगा कि हिन्दू शरणार्थियों की भीड़ में आतंकवादी संगठन अपने लोगों को शामिल नहीं करेंगे.  हालांकि सामाजिक नज़रिए से देखा जाए तो पाकिस्तानी हिन्दुओं के लिए हिन्दू बहुल भारत के अलावा कहीं और से उम्मीद की अपेक्षा नहीं है.


Pakistan Hindu Minderheit

80 साल के गोलाराम ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन उन्हें भारत लौटना पड़ेगा.

जहां तक राजनीति का सवाल है, तो भारत में हर छोटा बड़ा फैसला राजनीति से अछूता नहीं होता. यह बात दीगर है कि इस मामले में सियासत का ऊंट शरण की मांग कर रहे हिन्दुओं की तरफ करवट लेता दिख रहा है. दरअसल चुनाव की दहलीज पर खड़ी केंद्र और दिल्ली सरकार के लिए इस मामले को हल्के में लेने का मौका नहीं है. आजादी के बाद से ही देश में धर्मनिरपेक्ष माहौल कायम करने के लिए कांग्रेस धर्म विशेष के तुष्टिकरण की राजनीति को एक कारगर हथियार के तौर पर इस्तेमाल करती रही है. हालांकि इस सियासी हथियार का सार्थक परिणाम देश में कौमी एकता और भाईचारे के कायम रहने के रूप में देखने को मिल रहा है. लेकिन मौजूदा मामले में फिलहाल केंद्र और दिल्ली की सत्ता में बीजेपी के प्रमुख विपक्षी दल होने की वजह से कांग्रेस पाकिस्तानी हिन्दुओं की मांग को शिद्दत से सुनने पर विवश हो गई है.


कानूनी लिहाज से भी यह मामला भारत के लिए बेहद अहम है, बशर्ते सरकार इस मसले को कूटनीतिक तरीके से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाए. हकीकत तो ये है कि यह महज एक मजहबी मामला नहीं है, यह मानवाधिकार का मामला है. पाकिस्तान में हर हिन्दू परिवार शोषण का इस कदर शिकार है कि उसे मौत मंजूर है लेकिन पाकिस्तान नहीं. वहां की कट्टरपंथी जमात द्वारा जबरन धर्मान्तरण, महिलाओं की लुटती अस्मत और हर स्तर पर गैरबराबरी के चलते पाकिस्तानी हिन्दुओं का एकमात्र मकसद किसी तरह सरहद पार कर भारत में पहुंचना रह गया है. इसके लिए सैदाबाद से आये 80 साल के गोलाराम हों या लतीफाबाद से अपनी 5 साल की बेटी दिव्या को लेकर आये ताराचंद हों, वे हर जोखिम उठाने को तैयार है.

पाकिस्तान में हिन्दुओं के लिए लगातार बिगड़ते हालात को देखते हुए भारत के पास ये मौका है कि वह 8 अप्रैल 1950 को हुए नेहरु लियाकत समझौते का हवाला देकर यह मसला संयुक्त राष्ट्र में उठाए. इस समझौते के तहत दोनों मुल्कों ने अपने यहां रह रहे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी एक दूसरे को दी थी. भारत पाकिस्तानी हिन्दुओं की हालत सुधारने के लिए अन्तरराष्ट्रीय कानून के हवाले से माकूल कूटनीतिक दबाव बना सकता है.


जहां तक भारत आये हिन्दुओं को नागरिकता या शरण देने की बात है, सरकार के लिए इसमें देर करने का न तो कोई कारण है और न ही कानून की कोई अड़चन है. संविधानविद सुभाष कश्यप इसे पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि दिल्ली में ही रह रहे 480 लोगों की तफसील से जांच करना सरकार के लिए बिलकुल भी मुश्किल काम नहीं है. साथ ही नागरिकता कानून 1955 के तहत किसी अन्य विदेशी की तुलना में भारत से अलग होकर बने किसी देश के नागरिक को शरण, आश्रय या नागरिकता देना तुलनात्मक रूप से आसान है. हालांकि 8 अप्रैल से अब तक इन लोगों को पाकिस्तान वापस भेजने की कार्रवाई न करना भारत सरकार के सकारात्मक रुख का संकेत करती है. उम्मीद की यह किरण युवा ताराचंद के सपनों की उड़ान को पंख लगा सकती है, मासूम दिव्या की पढने की हसरत को पूरा कर सकती है और गोलाराम के लिए गंगा के तट पर पिंडदान कर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करा सकती है.


ब्लॉग: निर्मल यादव
संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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