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दुनिया

बुढ़ापे की चिंता में डूबा यूरोप

बुढापे में चैन की जिंदगी. यूरोप में भविष्य में यह बहुत से लोगों को नसीब नहीं होगा. लोगों की आयु लगातार बढ़ रही है, लेकिन जन्मदर लगातार घट रही है. यूरो संकट सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को लगातार संकट में में डाल रहा है.

उत्तर अफ्रीका में भयानक गरीबी या राजनीतिक दमन का सामना करने वाले हजारों लोग यूरोप को स्वर्ग मानते हैं. उनमें से बहुत से समुद्र के रास्ते अवैध रूप से यहां आने के लिए जान की बाजी लगा देते हैं. उन्हें यूरोप में बुढ़ापे की गरीबी पर बहस अजीब लगेगी . यूं भी अफ्रीका और औद्योगिक यूरोप में गरीबी की परिभाषाएं अलग अलग हैं.

लेकिन सचमुच यूरोप विकास के ऐसे मुकाम पर है जो निश्चित तौर पर अफ्रीका की स्थिति से बहुत दूर है, लेकिन यूरोपीय संघ में चिंता का कारण बन रहा है. सिर्फ बूढ़ा होता समाज ही नहीं बल्कि यूरो संकट भी यूरोप की सामाजिक कल्याण संरचना पर दबाव डाल रहा है. बहुत से यूरोपीय देशों में काम करने वाले लोगों की संख्या गिर रही है, साथ ही बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है. उसकी वजह से पेंशन भी कम हो रहा है और बचत पर बैंकों से मिलने वाला प्रीमियम भी.

अस्तित्व पर खतरा

यूरोपीय आयोग के आकलन के अनुसार हर साल 60 से ज्यादा उम्र के लोगों की तादाद 20 लाख बढ़ रही है. दस साल पहले यह संख्या सिर्फ 10 लाख थी. यूरोपीय देश इस समय अपने सकल घरेलू उत्पादन का दस फीसदी पेंशन पर खर्च कर रहे हैं. यह हिस्सा लगातार बढ़ रहा है. यूरोपीय संघ के देशों में इस समय 12 करोड़ पेंशनर हैं जो कुल आबादी का 24 फीसदी हैं.

कुछ साल पहले तक गरीब पेंशनर की तस्वीर जर्मनी या ब्रिटेन जैसे देशों के साथ नहीं जोड़ी जा सकती थी. इस बीच बहुत से लोग रिटायर करते ही आय में कमी के कारण सामाजिक पतन के खतरे का शिकार होते हैं. बहुत से मामलों में तो उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है. फ्रीडरिष एबर्ट फाउंडेशन के मिषाएल दाउदरस्टैट कहते हैं, "हालांकि ठोस आंकड़े नहीं हैं, लेकिन अधिकांश यूरोपीय देशों में वृद्धावस्था सुरक्षा की संरचना को देखते हुए आशंका है कि जोखिम बढ़ेगा."

मौजूदा जानकारी के अनुसार स्पेन, पुर्तगाल और ग्रीस में बुढ़ापे में गरीबी का अनुपात बहुत ज्यादा है. दाउदरस्टैट का कहना है कि यह अनुपात 20 से 27 फीसदी है, और वित्तीय संकट के कारण चलाए जा रहे बचत कार्यक्रम के कारण यह संख्या और बढ़ रही है. वे कहते हैं, "ग्रीस के बारे में मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं. वहां पेंशन में भारी कटौती की गई है."

Michael Dauderstädt Friedrich-Ebert-Stiftung

दाउदरस्टैट

सबसे पीछे ब्रिटेन

जर्मन सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी से जुड़े फ्रीडरिष एबर्ट फाउंडेशन के अनुसार सिर्फ यूरो संकट का सामना कर रहे देश ही बुढ़ापे की गरीबी का सामना नहीं कर रहे हैं, बल्कि ब्रिटेन जैसे देश भी. वहां सरकारी पेंशन अपेक्षाकृत कम है, इसलिए अतिरिक्त बीमा महत्वपूर्ण है. पेशेवर या निजी वृद्धावस्था बीमा पर पूंजी बाजार के संकट या फंड मैनेजरों की गलती का बहुत ज्यादा असर होता है. इसके विपरीत नीदरलैंड की हालत बेहतर है. 15 फीसदी गरीबी के साथ जर्मनी यूरोपीय देशों में बीच की जगह पर है. उसकी हालत ब्रिटेन या डेनमार्क से बेहतर है लेकिन नीदरलैंड से बुरी है.

बुढ़ापे में बढ़ती गरीबी का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर होगा. लिंग समानता यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में है. 1957 में ही समान काम के लिए समान वेतन का सिद्धांत रोम के समझौते में कानूनी तौर पर शामिल किया गया था. लेकिन हालत अभी भी सुधरे नहीं हैं. महिलाओं का औसत वेतन पुरुषों की तुलना में करीब 17 फीसदी कम है. इसकी वजह से बाद में उन्हें पेंशन भी कम मिलता है जिसके कारण पुरुषों की तुलना में बुढ़ापे में गरीबी का खतरा भी है.

महिलाओं का नुकसान

महिलाओं की पेंशन इस बात पर भी निर्भर करती है कि उन्हें अपने पति की पेंशन का कितना फायदा मिलता है. इसके अलावा बहुत सी महिलाएं पुरुषों की तुलना में पहले परिवार की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ देती हैं. परिवार के बड़े बूढ़ों की देखभाल में भी महिलाएं ज्यादा समय गुजारती हैं और उसके लिए भी अकसर नौकरी छोड़ देती हैं. इन सबका असर उनके पेंशन पर पड़ता है क्योंकि वे पुरुषों की तुलना में कम ही साल नौकरी करती हैं और बीमा में अपना हिस्सा चुकाती हैं.

अंडोर

यूरोपीय आयोग ने कुछ समय पहले इस विकास पर चिंता जताई और 2012 को पीढ़ियों के बीच एकजुटता का साल घोषित किया. इसके अलावा उसने सुझाव दिया कि यूरोप में लोगों को ज्यादा समय तक काम करना चाहिए. सामाजिक कल्याण संरचना को ढहने से बचाने के लिए यह भी सुझाव दिया गया कि महिलाओं और पुरुषों को समान समय तक काम करना चाहिए.

देर से रिटायर होना चाहते हैं यूरोपीय

समाज कल्याण कमिश्नर लाझलो अंडोर का कहना है कि पेंशन नियमों में हर देश को अपनी स्थिति का ख्याल रख सकते हैं लेकिन कुछ सिद्धांत पूरे यूरोपीय संघ के लिए हैं, जैसे पेंशन की उम्र और जीवन दर में सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए. वे कहते हैं, "समय रहते ही बुढ़ापे की आय के बारे में सोचना, रोजगार बढ़ाना और ज्यादा लोग ज्यादा समय तक बीमा चुकाएं यह सोचना जरूरी है, ताकि बुढ़ापे के लिए बेहतर आधार बन सके." स्वीडन इसकी अच्छी मिसाल है. दस साल से ज्यादा से वह पेंशन में जाने की उम्र को जीवन दर के साथ जोड़ रहा है और 55 से 64 की आयु में वहां सबसे ज्यादा लोग काम करते हैं.

अंडोर मानते हैं कि वित्तीय संकट की वजह से बुढ़ापे में वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा मुश्किल हो गई है, "लेकिन हम स्थिरता की वापसी के कदम तय कर सकते हैं." अंडोर के प्रस्तावों को बहुमत का समर्थन प्राप्त है. एक सर्वे के अनुसार 61 फीसदी यूरोपीय पेंशन पाने की आयु हो जाने के बाद भी शरीर ठीक ठाक होने पर काम करते रहना चाहते हैं.

रिपोर्ट: राल्फ बोजेन/एमजे

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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