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दुनिया

बुजुर्गों को मिला असम सरकार का कानूनी 'प्रणाम'

ऐसा कानून बनाने वाले भारत के पहले राज्य असम में 'प्रणाम' नाम के नये कानून के अंतर्गत राज्य सरकार के सभी कर्मचारियों के लिए अपने माता पिता और आश्रित दिव्यांग भाई बहन के भरण पोषण की जिम्मेदारी लेना अनिवार्य होगा.

भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम की विधानसभा में पारित एक नये कानून 'प्रणाम' (पेरेंट रिसपॉन्सिबिलिटी एंड नॉर्म्स फॉर एकाउंटेबिलिटी एंड मॉनिटरिंग) में कहा गया है कि राज्य सरकार का कोई कर्मचारी अगर अपने माता पिता और दिव्यांग भाई बहनों के भरण पोषण से इनकार करता है, तो उसके वेतन का 10 से 15 फीसदी हिस्सा काट कर माता पिता या संबंधित भाई बहनों को दे दिया जाएगा.

ऐसा कानून बनाने वाली यह देश की पहली विधानसभा है. देश में बुजुर्गों की बढ़ती तादाद और संतान की ओर से माता पिता की उपेक्षा के बढ़ते मामलों को ध्यान में रखते हुए सरकार का यह कदम काफी अहम माना जा रहा है. देश भर की अदालतों के समक्ष बुजुर्गों की ओर से अपने बच्चों के खिलाफ उपेक्षा के ऐसे हजारों मामले लंबित हैं.

नयाविधेयक

असम विधानसभा में पारित इस विधेयक में कहा गया है कि अगर कोई सरकारी कर्मचारी अपने माता पिता और दिव्यांग भाई बहनों की देखभाल नहीं करता तो उसके वेतन में से 10 से 15 फीसदी रकम काट ली जाएगी. राज्य के वित्त, स्वास्थ्य व शिक्षा मंत्री हिमंत विश्वशर्मा बताते हैं, 'अगर घर में उपेक्षा का शिकार होना पड़ता हो तो ऐसे मां-बाप इसकी शिकायत कर सकते हैं.'

इस विधेयक के तहत कर्मचारियों के वेतन से काटी गई रकम को माता पिता या भाई बहन के खाते में ट्रांसफर करने का प्रावधान है. शर्मा कहते हैं, 'यह कानून समाज के बुजुर्गों के प्रति सरकार का सम्मान है.' राज्य सरकार ने बीते साल के बजट में ऐसा कानून बनाने का प्रस्ताव रखा था. सरकार अब राज्य के निजी व सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों के कर्मचारियों के लिए भी ऐसा ही एक और कानून बनाने पर विचार कर रही है.

मिली-जुलीप्रतिक्रिया

असम के आम लोगों ने इस फैसले पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है. खासकर सरकारी कर्मचारी इससे नाखुश नजर आ रहे हैं. एक सरकारी कर्मचारी ने नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर बताया, 'यह हमारे निजी जीवन में हस्तक्षेप के समान है.' लेकिन बेटे की उपेक्षा के शिकार सुजीत बरगोहाईं कहते हैं, 'बेटा परिवार के साथ शहर में है. हम गांव में रहते हैं. लेकिन उसने कभी हमारे लिए कोई पैसा नहीं भेजा है.' उनको उम्मीद है कि इस नए कानून के डर से शायद बेटा अब उनकी देखभाल करेगा.

वहीं विपक्षी राजनीतिक दलों ने सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए इसे असमिया समाज का अपमान करार दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं, 'असमिया समाज में बुजुर्गों और भाई बहनों की देखरेख करने की पुरानी परंपरा रही है. सरकार का नया कानून इस समाज का अपमान तो है ही, यह सरकारी कर्मचारियों के निजी जीवन में हस्तक्षेप भी है.'

लेकिन वित्त मंत्री हिमंत कहते हैं, 'यह निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं है. इस कानून का मकसद घर में उपेक्षित बुजुर्गों को संबंधित कर्मचारी के खिलाफ शिकायत का अधिकार देना है.' उक्त कानून में कहा गया है कि किसी कर्मचारी के खिलाफ ऐसी शिकायत मिलने के बाद विभागीय प्रमुख दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद वेतन में कटौती का फैसला करेंगे.

बुजुर्गों की बढ़ती तादाद

भारत में बुजुर्गों की तादाद लगातार बढ़ रही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में वर्ष 2016 तक बुजुर्गों यानी 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की तादाद 11.30 करोड़ थी. संयुक्त परिवारों के टूटने की वजह से कई परिवारों में बूढ़े मां बाप और दिव्यांग भाई बहनों की उपेक्षा की शिकायतें भी सामने आने लगी हैं. बुजुर्गों के हित में काम करने वाले एक गैरसरकारी संगठन 'हेल्पएज इंडिया' ने अपनी ताजा रिपोर्ट में इस बारे में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किये हैं. उसमें कहा गया है कि देश में हर तीन में से एक बुजुर्ग अपनी ही संतान की उपेक्षा व अत्याचारों का शिकार है.

अत्याचार के ज्यादातर मामलों की जड़ में संपत्ति का विवाद होता है. ऐसे आधे से ज्यादा मामलों में बेटे ही मां-बाप पर अत्याचार करते हैं. वहीं एक चौथाई से कम मामलों में बेटियों पर ऐसे आरोप हैं. हेल्पएज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथ्यू चेरियन कहते हैं, "पहले लोग रिटायर होने के बाद अपने बच्चों के साथ रहते थे. लेकिन देश में एकल परिवारों का चलन बढ़ने की वजह से अब ऐसा नहीं हो पा रहा है. नतीजतन बुजुर्ग लोग ऐसी जगहों पर रहना पसंद करते हैं जहां वह सम्मान के साथ जी सकें." वह कहते हैं कि देश में बुजुर्गों की बढ़ती तादाद के मुकाबले ओल्ड एज होम्स की भारी कमी है.

वर्ष 2006 में बुजुर्गों व वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण के लिए पारित एक कानून के बाद केंद्र ने देश के हर जिले में कम से कम एक ओल्ड एज होम बनाने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन मैथ्यू का कहना है कि देश में बुजुर्गों की तेजी से बढ़ती तादाद को ध्यान में रखते हुए यह नाकाफी है.

ग्रामीणइलाकेभीअछूतेनहीं

चिंता की बात यह है कि बुजुर्गों की उपेक्षा का यह सिलसिला महज शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है. देश के ग्रामीण इलाकों में भी ऐसे मामले बढ़ रहे हैं. इलाके के ज्यादातर युवक अपने परिवार के साथ नौकरी या रोजगार के लिए शहरों में जाकर बसने लगे हैं. गांव में पीछे छूटे मां-बाप को उनकी किस्मत के सहारे छोड़ने वाले ऐसे युवक कभी-कभार कुछ रुपये भेज कर ही अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं. गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले बुजुर्गों को सरकार 'इंदिरा गांधी नेशनल ओल्ड एज पेशंन स्कीम' के तहत हर महीने दो सौ रुपए की सहायता जरूर देती है. लेकिन वह रकम एक सप्ताह के लिए भी नाकाफी है. मैथ्यू कहते हैं, "नीतिगत स्तर पर सरकार को मौजूदा माहौल में बुजुर्गों के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा मुहैया करानी होगी. इसके अलावा पेंशन की रकम बढ़ा कर न्यूनतम एक हजार रुपये करनी होगी."

समाजविज्ञानियों का कहना है कि टूटते संयुक्त परिवारों ने इस समस्या को और भयावह बना दिया है. इस पर काबू पाने के लिए सरकार को जहां बुजुर्गों के कल्याण में और ठोस योजनाएं बनानी होंगी, वहीं गैरसरकारी संगठनों को भी इसके लिए आगे आना होगा. उनको उम्मीद है कि असम सरकार ने इस दिशा में जो राह दिखायी है उसका दूसरे राज्य भी अनुसरण करेंगे.

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