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ब्लॉग

बीजेपी में बदलते समीकरण

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में परिवर्तन आ गए हैं. लालकृष्ण आडवाणी से लेकर मुरली मनोहर जोशी और लालजी टंडन भी बदलावों से प्रभावित हुए हैं. बीजेपी में पीढ़ी-परिवर्तन हुआ है.

इस प्रक्रिया की शुरुआत तो तभी हो गई थी जब 2005 में पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना के बारे में पार्टी अध्यक्ष और वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी की टिप्पणियों की प्रतिक्रिया में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे युवा नेता सार्वजनिक रूप से उनके खिलाफ खड़े हो गए थे.

तब आडवाणी को अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा था. हालांकि इसके बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया, लेकिन पार्टी की हार के बाद संगठन के मामलों में आडवाणी की राय को महत्व मिलना लगातार कम होता गया जबकि एक समय पूरे संगठन की बागडोर उनके हाथों में हुआ करती थी.

इसमें कोई संदेह नहीं कि बीजेपी को भारतीय राजनीति का एक ध्रुव बनाने का श्रेय आडवाणी को ही जाता है. इसके बावजूद यह भी सच है कि भारतीय राजनीति में गरिमापूर्वक विदा लेने की परंपरा नहीं है. इसलिए भारत में प्रधानमंत्री और मंत्री अक्सर ऐसे लोग ही बनते हैं जिनकी उम्र सत्तर वर्ष से अधिक होती है. इसके इक्का-दुक्का अपवाद भी हैं, मसलन राजीव गांधी, लेकिन आम तौर पर यही देखने में आता है.

आडवाणी की शिकायत

पार्टी में महत्व कम होने के बावजूद आडवाणी ने उसके मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने दिया. हर बार उनके हाथ निराशा ही आई. पिछ्ले साल जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी की केन्द्रीय चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाया गया, तो इसके विरोध में आडवाणी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया.

10 जून 2013 को उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को लिखा कि अब बीजेपी वैसी आदर्शवादी पार्टी नहीं रह गई है जैसी वह श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी के समय में थी जिनका एकमात्र सरोकार देश और देशवासी थे. आडवाणी ने यह भी लिखा कि अब अधिकांश नेताओं का अपना-अपना निजी एजेंडा है और देश या पार्टी की किसी को फिक्र नहीं है.

घुटना टेकते नेता

लेकिन उनके इस्तीफे का कोई असर नहीं हुआ और एक दिन बाद ही उन्होंने उसे वापस ले लिया. फिर जब सितंबर में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी का उम्मीदवार घोषित किया गया, तब भी आडवाणी ने अपनी नाराजगी नहीं छुपाई और भोपाल के एक जनसभा में वह मोदी की उपेक्षा करते हुए दिखे. लेकिन अगले माह ही उन्होंने गुजरात जाकर मोदी की प्रशंसा कर डाली और कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देखकर वह खुश होंगे.

इस माह जब भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ने की उनकी इच्छा को भी पार्टी ने ठुकरा दिया, तो वह गांधीनगर से खड़े होने को राजी हो गए. आडवाणी के बार-बार घुटने टेकने से साबित हो गया कि बीजेपी पर नरेंद्र मोदी का वर्चस्व अब निर्विवादित रूप से स्थापित हो चुका है. एक दूसरे वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को उनकी इच्छा के खिलाफ बनारस से हटा कर वहां से मोदी को उम्मीदवार बनाया गया है.

लखनऊ से राजनाथ सिंह

लालजी टंडन का लखनऊ से टिकट काट कर स्वयं पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह वहां से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. एक अन्य वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह का बाड़मेर से टिकट काट कर कांग्रेस छोड़कर आए सोनाराम को दे दिया गया. इससे खफा होकर जसवंत सिंह ने पार्टी छोड़ दी. यही नहीं, सुषमा स्वराज जैसी अपेक्षाकृत युवा नेता भी ट्वीट करके सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी व्यक्त करने पर विवश हैं क्योंकि उनकी भी नहीं चल रही.

उन्होंने खान-घोटाले में फंसे श्रीरामुलू को पार्टी में लिए जाने पर आपत्ति प्रकट की थी. स्वराज ने जसवंत सिंह के साथ किए गए बर्ताव पर भी ऐतराज जताया था. लेकिन अरुण जेटली ने अपने ब्लॉग में पार्टी के फैसलों को सही बताते हुए वरिष्ठ नेताओं को सलाह दी थी कि वे "न" को स्वीकार करने की आदत भी डालें.

मोदी की लहर

बीजेपी दावा कर रही है कि देश भर में नरेंद्र मोदी की लहर चल रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि बीजेपी की हालत कांग्रेस से बेहतर है. लेकिन उसके वरिष्ठ नेताओं के आपसी झगड़े गंभीर रूप लेते जा रहे हैं. इस बात के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता कि मध्यप्रदेश में सुषमा स्वराज ने अब तक जितनी चुनाव सभाएं संबोधित की हैं, उनमें किसी में भी उन्होंने नरेंद्र मोदी का नाम तक नहीं लिया. दरअसल गुजरात में मोदी ने जिस तरह अन्य नेताओं को हाशिये पर धकेल कर पार्टी और सरकार पर अपनी गिरफ्त बनाई, उससे भी केंद्रीय नेता आशंकित हैं, भले ही वे अभी बोल न रहे हों.

बीजेपी यह मान कर चल रही है कि मोदी प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. लेकिन लोग यह सवाल तो उठा ही रहे हैं कि यदि देश में इतनी जबर्दस्त मोदी लहर चल रही है, तो फिर मोदी को बनारस और वडोदरा—दो स्थानों से चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है? इसके अलावा जिस तरह से बीजेपी दल-बदलुओं और भ्रष्ट एवं आपराधिक छवि के नेताओं को पार्टी में शामिल कर रही है और उन्हें चुनाव में टिकट दे रही है, उससे न केवल पार्टी के भीतर असंतोष है बल्कि जनता के बीच उसकी छवि भी खराब हो रही है.

ब्लॉगः कुलदीप कुमार

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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