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ब्लॉग

बीजेपी को याद आई हिंदी

अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख भारतीय जनता पार्टी धीरे-धीरे अपनी मूल प्रतिबद्धताओं की ओर लौट रही है. इसके पीछे एक कारण यह भी है कि उसके नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल दलों की संख्या लगातार घटती जा रही है.

बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में अब केवल शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना ही बचे हैं. गुजरात में पिछले साठ सालों से बसे सिखों से लीज पर मिली जमीन खाली करने को कहा जा रहा है जिससे उनमें बेहद आक्रोश है. यदि यह मसला न सुलझा तो बहुत संभव है कि सिखों के हितों का प्रवक्ता होने का दावा करने वाला अकाली दल भी गठबंधन से बाहर हो जाये. इस सबका सीधा असर यह है कि गठबंधन को बनाए रखने के लिए बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संविधान की धारा 370 की समाप्ति, समान नागरिक आचार संहिता और अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर भव्य राममंदिर के निर्माण की अपनी जो मांगे ठंडे बस्ते में डाल थीं, उन्हें अब आसानी से बाहर निकाल सकती है.

भारतीय जनसंघ के जमाने से ही उसका हिन्दी के प्रयोग पर विशेष जोर रहा है. अब बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने यह कहकर कि अंग्रेजी भाषा के कारण देश को बहुत नुकसान झेलना पड़ा है, यह संकेत दिया है कि उनकी पार्टी अंग्रेजी-विरोध और हिन्दी-समर्थन की पुरानी नीति की ओर लौट रही है.

ब्रिटिश शासन के विरोध में चले राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हिन्दी देश को एक सूत्र में बांधने वाली भाषा के रूप में उभरी थी और तमिल के महाकवि सुब्रह्मण्य भारती और बांग्ला के महान लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी उसे देश की संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार करते थे. दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की गतिविधियों के कारण दक्षिण में हजारों लोगों ने चाव से हिन्दी सीखी. यही कारण था कि संविधान में यह प्रावधान रखा गया कि राजकाज की भाषा में अंग्रेजी का इस्तेमाल क्रमशः कम किया जाएगा और पंद्रह साल बाद पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा और उसकी जगह हिन्दी ले लेगी. लेकिन स्वाधीनता प्राप्ति के बाद अहिंदीभाषी लोगों में हिन्दी के प्रति विरोध बढ़ा और अंग्रेजी आज भी शासन की मुख्य भाषा बनी हुई है॰

शासन की ही नहीं, वह उच्च शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान की भी प्रमुख भाषा है॰ सभी जानते हैं कि सूचना तकनीकी और सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भारत के अग्रणी देश बनने के पीछे बहुत हद तक यहां अंग्रेजी का व्यापक प्रसार है, और इस मामले में भारत चीन से बेहतर स्थिति में है. प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया के अनुयायियों द्वारा छेड़े गए अंग्रेजी-हटाओ आंदोलन का हिन्दी क्षेत्रों में भी कोई विशेष असर नहीं हुआ. विडम्बना यह थी कि कभी लोहिया के अनुयायी रहे मुलायम सिंह यादव ने 1991 में अंग्रेजी के बहिष्कार की बात कही, उस समय उनके पुत्र अखिलेश, जो आजकल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, स्वयं एक अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे थे. बीजेपी के भी अधिकांश नेताओं के बच्चे हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूलों के बजाय अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों में ही पढ़े हैं और पढ़ रहे हैं॰

हकीकत यह है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश और उसके बाद श्रेष्ठ प्रदर्शन बिना अंग्रेजी के अच्छे ज्ञान के नहीं हो सकता. यानि जीवन में सफलता और बेहतर नौकरियां पाने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान होना अनिवार्य है. आज गांव-कस्बों में रहने वाले आम माली हालत के माता-पिता भी अपना पेट काटकर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भर्ती कराते हैं.

अंग्रेजी के विरोधी और हिन्दी के झंडाबरदार यह भूल जाते हैं कि आज भी हिन्दी मुख्यतः साहित्य और पत्रकारिता की भाषा बनी हुई है. प्राकृतिक विज्ञान, समाजविज्ञान, दर्शन और तकनीकी जैसे विषयों में हिन्दी में मौलिक पुस्तकें नहीं लिखी जातीं॰ सीमित संख्या में जो पुस्तकें उपलब्ध हैं, वे सभी अनुवाद की हुई हैं और अकसर पाठकों की समझ में नहीं आतीं क्योंकि हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली का मानकीकरण नहीं हो पाया है॰ एक ही अवधारणा के लिए कई शब्द प्रचलित हैं॰ सरकार की ओर से स्थापित संस्थाओं ने जिस प्रकार की पारिभाषिक शब्दावली गढ़ी है, वह अक्सर अर्थ संप्रेषित करने में असफल रहती है क्योंकि उसे जहां जरूरत नहीं है वहां भी संस्कृत शब्दभंडार से शब्द लेकर गढ़ा गया है॰ हिन्दी में पेशेवर अनुवादक तो हैं, लेकिन किसी एक विषय में विशेषज्ञता रखने वाले अनुवादक नहीं हैं जिसकी वजह से अनुवाद अक्सर पूरी तरह विश्वसनीय नहीं होते॰ इसलिए किसी भी विषय को गहराई से जानने के लिए आज भी अंग्रेजी की शरण लेनी पड़ती है॰

आज स्थिति यह है कि फ्रांस जैसे देश में भी, जो भारत की तरह बहुभाषी देश नहीं है और जिसे अपनी भाषा और संस्कृति पर बहुत गर्व है, ऐसे कानून बन रहे हैं जिनके तहत विश्वविद्यालयों में फ्रेंच के अलावा अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषाओं में भी पढ़ाई संभव हो सकेगी॰ इस समय यूरोप से लेकर चीन तक गैर-अंग्रेजीभाषी देश अंग्रेजी में दक्षता प्राप्त करने के लिए जी-जान से लगे हैं॰ भारत में मध्यवर्गीय युवा ही नहीं, निचले वर्गों के युवा भी अंग्रेजी भाषा में दक्षता प्राप्त करने को ही सफलता की पहली सीढ़ी समझते हैं॰ ऐसे में अंग्रेजी-हिन्दी विवाद छेड़कर राजनाथ सिंह क्या हासिल करना चाहते हैं?

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड जैसे हिंदीभाषी राज्यों में बीजेपी सत्ता में नहीं है॰ संभवत: राजनाथ सिंह इन क्षेत्रों के उन बहुसंख्यक युवा मतदाताओं को रिझाना चाहते हैं जो अंग्रेजी में दक्षता की कमी के कारण कठिनाइयां झेल रहे हैं॰ वह शायद उन्हें यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो अंग्रेजी का वर्चस्व समाप्त करेगी ताकि उन लोगों को लाभ मिल सके जो अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाये हैं॰ जो भी हो, उनका बयान समय के रुझान से मेल नहीं खाता॰

ब्लॉगः कुलदीप कुमार, दिल्ली

संपादनः एन रंजन

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