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ब्लॉग

बीजेपी के दावे का उल्टा हो सकता है असर

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने के भारतीय जनता पार्टी के दावे पर सवालिया निशान लगाने वालों की भी कमी नहीं है. काडर वाली पार्टी का सिर्फ प्रचार के बल पर राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास उल्टा पड़ सकता है.

कांग्रेस नेताओं ने सार्वजनिक रूप से बीजेपी के दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने के दावे की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं. आज एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के मुखपृष्ठ पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें उसके संवाददाता ने सविस्तार अपना अनुभव बताते हुए दो-टूक ढंग से लिखा है कि उसके मोबाइल फोन पर एक मिस्ड कॉल आई और उस नंबर पर फोन करने पर उसे सूचित किया गया कि वह भारतीय जनता पार्टी का सदस्य बन गया है और उसका अनुक्रमांक यह है. अब उसके लिए इस सदस्यता से पीछा छुड़ाने का कोई रास्ता नहीं.

हाई-टेक की राह

बीजेपी ने हाई-टेक पार्टी बनने का रास्ता लगभग तभी अख्तियार कर लिया था जब 1990 में लालकृष्ण आडवाणी डीसीएम टोयोटा को रामरथ में तब्दील करा कर देशव्यापी रथयात्रा पर निकल पड़े थे. लोग भूले नहीं हैं कि इस यात्रा की योजना और उसके क्रियान्वयन के साथ नरेंद्र मोदी बहुत निकट से जुड़े थे. इसके बाद से बीजेपी किसी भी अन्य राजनीतिक पार्टी की तुलना में नित परिवर्तनशील तकनीकी का कहीं अधिक इस्तेमाल करती आई है. पिछले लोकसभा चुनाव में फेसबुक और ट्विटर जैसे सामाजिक माध्यमों का बीजेपी ने जबर्दस्त इस्तेमाल किया और नरेंद्र मोदी की होलोग्राम चुनाव सभाओं ने तो सबको विस्मय में डाल दिया. इस प्रयोग की सफलता सबके सामने है.

इसी तरह काफी समय से बीजेपी मोबाइल फोन पर संदेश भेज कर चुनाव प्रचार भी करती रही है. उसके नेता, सांसद और विधायक भी त्यौहारों तथा विशेष अवसरों पर मोबाइल फोन पर अपने क्षेत्र के सभी निवासियों को संदेश भेजते रहे हैं, चाहे वे बीजेपी के समर्थक हों या न हों. इसका कोई बुरा भी नहीं मानता क्योंकि लोकतंत्र में सभी को सभी से संवाद करने का अधिकार है. आबादी बढ़ने और चुनाव क्षेत्र फैलते जाने के कारण पहले की तरह दरवाजे-दरवाजे जाकर प्रचार करना और पार्टी के सदस्य बनाना यूं भी बहुत आसान नहीं रह गया है. इसलिए यह बहुत स्वाभाविक है कि नई तकनीकी की मदद ली जाए.

लेकिन बीजेपी के ताजातरीन दावे के पीछे सिर्फ यह महत्वाकांक्षा काम करती लगती है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा कर सके. उसके इस सदस्यता अभियान के दौरान जिस प्रकार लोगों को बीजेपी के बारे में कुछ भी बताए बिना और उनकी सहमति लिए बिना पार्टी का सदस्य बना लिया गया है, उससे इस सदस्यता अभियान की विश्वसनीयता पर भरोसा नहीं होता. मसलन, कांग्रेस का कहना है कि गोवा में बीजेपी चार लाख सदस्य होने का दावा कर रही है लेकिन कुछ समय पहले हुए जिला परिषद चुनाव में उसे कुल मिलाकर डेढ़ लाख वोट मिले थे. कांग्रेस ने सवाल किया है कि क्या बीजेपी के ढाई लाख सदस्यों ने भी उसके उम्मीदवारों को वोट नहीं दिया?

हमदर्दी या रोष

इसका जवाब देते हुए बीजेपी प्रवक्ता नलिन कोहली ने कहा है कि सभी सदस्य पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता नहीं होते. किसी पार्टी का सदस्य होने का मतलब यह होता है कि वे पार्टी की विचारधारा और उसके कामकाज का समर्थन करते हैं. लेकिन अनेक लोगों का अनुभव यह है कि उनसे यह पूछे बिना कि वे बीजेपी से सहमत हैं या नहीं, उन्हें मोबाइल फोन के जरिये सदस्य बना लिया गया. इससे उनके भीतर बीजेपी के प्रति हमदर्दी के बजाय रोष ही पैदा हो रहा है.

दरअसल बीजेपी शुरू से ही प्रचार पर बहुत अधिक जोर देती रही है. नरेंद्र मोदी को ‘महानायक' बनाने और उनकी लहर पैदा करने में हर स्तर और हर तरह से किए गए धुआंधार प्रचार की बहुत बड़ी भूमिका रही है. लेकिन जैसे-जैसे इस प्रचार की असलियत खुलती जा रही है, जैसे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का यह स्पष्टीकरण कि मोदी का यह वादा कि 100 दिन में विदेश से काला धन वापस लाया जाएगा जिसके कारण हरेक की जेब में 15-15 लाख रुपया पहुंचेगा, केवल एक चुनावी जुमला था, लोगों का मोहभंग हो रहा है. ‘स्वच्छ भारत अभियान' को बहुत धूमधाम और बाजे-गाजे के साथ छेड़ा गया, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर तीन दिन तक सफाई कर्मचारी कूड़ा-कचरा फेंकते रहे. राजधानी दिल्ली हो या शेष देश, किसी भी हिस्से के स्वच्छ होने की कोई खबर नहीं है.

ऐसे में सिर्फ प्रचार के बल पर राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास उल्टा पड़ सकता है. बीजेपी की पहचान एक काडर-आधारित पार्टी के रूप में रही है जिसके पास अनुशासित कार्यकर्ताओं का देशव्यापी विस्तृत नेटवर्क है. उसकी इसी पहचान से लोग प्रभावित हुए हैं. संदिग्ध तरीकों से विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का तमगा हासिल करने से उसकी लोकप्रियता या साख बढ़ेगी, इसमें संदेह है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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