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जर्मन चुनाव

बीजेपी की उम्मीद है मध्य प्रदेश

लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को गुजरात के बाद सबसे ज्यादा उम्मीद मध्य प्रदेश से है. नतीजों के मामले में मध्यप्रदेश गुजरात से आगे निकल सकता है. यहां मोदी लहर से ज्यादा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का प्रभाव है.

शिवराज सिंह चौहान की तीन जीतों के बाद बीजेपी का गढ़ बन चुके मध्यप्रदेश में उनका जादू बरकरार है और यही कारण है कि यहां उत्तर प्रदेश के बाद पार्टी को सबसे ज्यादा सीटों की उम्मीद है. 29 लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति अंदरूनी कलह और गुटबाजी से चलते कमज़ोर नज़र आ रही है.

कांग्रेसी गुटबाजी भाजपा के लिए वरदान

राज्य में कांग्रेस पार्टी के नेता ही भाजपा का रास्ता आसान कर रहे हैं. दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे बड़े नेताओं में आपसी तालमेल की भारी कमी है. कार्यकर्त्ता और उम्मीदवार भी गुटों में विभाजित हैं जिसका बुरा असर पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ रहा है. कांग्रेसी गुटबाजी के अलावा केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार के प्रति लोगों में गुस्सा भी राज्य में पार्टी के लिए मददगार नहीं है.

भिंड से कांग्रेस उम्मीदवार बनाये गए भागीरथ प्रसाद उम्मीदवारी की घोषणा के दूसरे ही दिन भाजपा में शामिल हो गए जिससे पार्टी को भारी शर्मिंदगी उठानी पड़ी. इसके अलावा कई दूसरे नेता भी पार्टी छोड़ कर भाजपा या आप में शामिल हो रहे हैं. भाजपा की चुनौती के बावजूद छिंदवाड़ा से कमलनाथ और गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया मतदाताओं के बीच अपनी लोकप्रियता के चलते फिर से संसद पहुंच सकते हैं. मन्दसौर से पार्टी की प्रत्याशी और राहुल गांधी की करीबी मीनाक्षी नटराजन क्षेत्र में अपनी सक्रियता के बावजूद यूपीए सरकार की नाकामियों की शिकार बन सकती हैं.

आप और बसपा भी मैदान में

आम आदमी पार्टी ने प्रदेश में लाखों सदस्य बनाए हैं. इस पार्टी के प्रति लोगों में जिज्ञासा भी है, लेकिन पिछले दो महीने में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते यहां उसकी चुनावी संभावनाएं काफी धूमिल हैं. पार्टी के सबसे बड़े नेता अरविंद केजरीवाल प्रचार के लिए नहीं आ पाए हैं. इसके बावजूद कुछ जगहों पर आप की उपस्थिति कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही नुकसान पहुंचाएगी.

बहुजन समाज पार्टी राज्य में तीसरी ताकत के रूप में रही है. दलितों की पार्टी मानी जाने वाली बसपा ने लोकसभा में अपना खाता 1991 में मध्यप्रदेश की एक सामान्य सीट से ही खोला था. बुंदेलखंड और विंध्य प्रदेश की कुछ सीटों पर इस बार बसपा के उम्मीदवार अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहेंगे. दलित मतदाता पार्टी से तो प्रभावित हैं लेकिन बहुत असरदार प्रत्याशी के न होने से जीत की संभावना कम है.

शिवराज का मिशन 29

लोकसभा चुनावों में भाजपा 272 का मिशन लेकर चल रही है लेकिन मध्य प्रदेश भाजपा का एक ही लक्ष्य है मिशन 29, यानी कांग्रेस का पूर्ण सफाया. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को यकीन है कि उनकी पार्टी सभी 29 सीटों पर जीत हासिल करेगी. अपने मुख्यमंत्री की सादगी और सौम्यता के कायल जबलपुर के शरद कुमार का मानना है कि शिवराज सिंह चौहान की बेहतर छवि के चलते यहाँ भाजपा बेहतर परिणाम दे सकती है.

शिवराज फैक्टर के रहते मध्य प्रदेश में मोदी लहर है भी या नहीं कुछ पता नहीं चलता. जबलपुर में प्रबंधन की पढाई कर रहे मनोज सिंह जैसे कुछ उत्साहित भाजपा समर्थक शिवराज सिंह चौहान को नरेंद्र मोदी से बेहतर नेता बताते हैं. लालकृष्ण आडवाणी की पसंद शिवराज सिंह चौहान ने अपनी महत्वाकांक्षा को अब तक जाहिर नहीं किया है.

मध्य प्रदेश में चुनावी मुद्दे

राज्य में भूख और कुपोषण जैसे मुद्दों को जहां कांग्रेस ने उठाने की कोशिश की है वहीं यूपीए सरकार के घपलों-घोटालों को भाजपा अपना हथियार बनाए हुए है. वैसे भ्रष्टाचार के दाग प्रदेश में भाजपा की अपनी सरकार पर भी हैं. इसलिए दोनों प्रमुख पार्टियां नेतृत्व के मुद्दे पर जोर दे रही हैं. शहरी मतदाताओं के बीच नरेंद्र मोदी, अरविन्द केजरीवाल, राहुल गांधी और शिवराज सिंह चौहान की नेतृत्व क्षमता को लेकर चर्चा होती है.

मीडिया के प्रभाव के चलते देश के असल मुद्दों पर चर्चा कम ही हो रही है. स्थानीय मुद्दों से ज्यादा राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित चुनाव के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों का मुद्दा छाया हुआ है. मार्च के पहले पखवाड़े में हुई बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि ने राज्य के किसानों पर जमकर कहर बरपाया है. इससे रबी की तैयार फसल बर्बाद हो गई है. किसानों के इस दर्द पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मरहम लगाने की रस्मी कोशिश की. अमझर, जबलपुर के किसान रामदयाल कहते हैं, "उन्हें कोई भी राजनीतिक पार्टी किसानों की बदहाली के प्रति गंभीर नजर नहीं आती."

रिपोर्ट: विश्वरत्न श्रीवास्तव, भोपाल

संपादन: महेश झा

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