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मंथन

बिना जीपीएस के नेविगेशन की खोज

जीपीएस के बिना अंजानी जगह का सही सही पता लगाना बहुत मुश्किल है. लेकिन जीपीएस में बहुत डाटा लगता है. साथ ही यह ईमारतों के भीतर की सटीक जानकारी नहीं देता है. अब इस समस्या का एक विकल्प खोजा गया है.

लोकेशन की ट्रैकिंग जीपीएस की मदद से होती है. जीपीएस यानि ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम वही सिस्टम है जो कारों के नेविगेटर में भी लगा होता है. लेकिन बड़ी ऊंची इमारतों में कंक्रीट की दीवारों के कारण जीपीएस ठीक से काम नहीं करता. जर्मनी का फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट एक अलटर्नेटिव सिस्टम पर काम कर रहा है, ताकि इमारतों के अंदर भी लोकेशन ट्रैक हो सके.

मोबाइल फोन के हर यूजर ने ये अनुभव किया होगा कि स्टेशन पर नेविगेशन ऐप काम नहीं करता और सुपर बाजार में सिग्नल बहुत कमजोर रहता है. मेट्रो हो, एयरपोर्ट या म्यूजियम जीपीएस का सिग्नल हमेशा परेशान करता है. इमारतों में पोजीशन का पता करने के लिए अब एक नई विधि की मदद ली जा रही है जिसे फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने डेवलप किया है. इसके लिए उपलब्ध नेटवर्क की मदद ली जाती है, चाहे वह वाई फाई हो, जीएसएम या ब्लूटूथ.

नई तकनीक को इमारतों के अंदर नेविगेट करने लिए अपने सिग्नल नेटवर्क की जरूरत नहीं होती. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट आईआईएस के श्टेफेन मायर कहते हैं, "आप वाई फाई या ब्लूटूथ के सिग्नल का इस्तेमाल करते हैं. हर ट्रांसमीटर का एक रेंज होता है और इमारत के अंदर एक टिपिकल सिग्नल स्ट्रेंथ होती है. इसे पहले ही रजिस्टर कर लिया जाता है. और इस सिग्नल स्ट्रेंथ की तुलना कर पोजीशन तय की जाती है."

इसके लिए सबसे पहले वाई फाई ट्रांसमीटर या हॉट स्पॉट जैसे ट्रांसमीटर नेटवर्क का सिग्नल स्ट्रेंथ मापा जाता है. और वह भी कमरे में अलग अलग जगहों पर. हर जगह सिग्नल की क्षमता अलग अलग होती है लेकिन अपने तरह से अनोखी. इसीलिए इन जगहों को बाद में फिर से नेटवर्क मिल जाता है. श्टेफेन मायर बताते हैं, "एक जगह पर मैं खास संख्या में टिपिकल सिग्नल स्ट्रेंथ वाले स्टेशन पाता हूं. यह उस जगह के फिंगरप्रिंट की तरह है और इसे मैं फिर से पहचान सकता हूं." इन बहुत सारे फिंगरप्रिंट को डाटा बैंक में जमा किया जाता है और उसे मोबाइल एपलायंस में ट्रांसफर कर दिया जाता है, ताकि उसे मौके पर अपनी पोजीशन तय करने के लिए इस्तेमाल किया जा सके.

ट्रैकिंग के समय मोबाइल फोन खास सिग्नल स्ट्रेंथ का प्रोटोटाइप रिसीव करता है. और वह उसकी तुलना डाटा बैंक में जमा सिग्नल स्ट्रेंथ प्रोटोटाइपों के साथ करता है और उससे मौजूदा पोजीशन का आकलन किया जाता है. लोकलाइजेशन इस तरह से काम करता है कि इंस्ट्रूमेंट को ताजा मेजरमेंट मिलता है, जिसका सिग्नल स्ट्रेंथ पैटर्न होता है. वह डाटा बैंक में जमा किसी न किसी सिग्नल स्ट्रेंथ पैटर्न से मिलता जुलता होता है. इसका मतलब है कि आप इस सिग्नल पैटर्न के पास खड़े हैं.

इस तकनीक का वहां इस्तेमाल किया जा सकता है जहां जगह की ठीक ठीक सूचना पाने की जरूरत है. मसलन म्यूजियम में यह ऐप यूजर को कमरे से कमरे में ले जाता है और वहां दिखाई जा रही चीजों के बारे में बताता है. कैफेटेरिया में विजिटर को वहां मिलने वाले सामानों की सूचना भी मिलती है. एंट्रेंस एरिया में म्यूजियम के खुलने और बंद होने के समय की जानकारी मिलती है और टिकट की कीमतों की भी.

नया नेविगेशन ऐप म्यूजियम और कैफेटेरिया में लोगों की मदद करने के अलावा और भी बहुत कुछ कर सकता है. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट आईआईएस के श्टेफेन मायर इसके बारे में बताते हैं, "हवाई अड्डे पर मैं जानना चाहता हूं कि मेरी फ्लाइट किस गेट से जा रही है और वहां तक पहुंचने में मुझे कितना वक्त लगेगा. ट्रेन में सफर करते हुए मैं जानना चाहता हूं कि मेरी गाड़ी किस प्लेटफॉर्म पर आ रही है और मैं सिटी ट्रेन तक कैसे पहुंचूंगा."

लेकिन जीपीएस के मुकाबले इस सॉफ्टवेयर की महत्वपूर्ण खासियत यह है कि यह बहुमंजिला इमारतों में भी नेविगेट कर सकता है. हरा प्वाइंट इमारत में यूजर की जगह दिखाता है. जगह बदलने पर इसकी पोजीशन बदल जाती है. इमारत के अंदर थ्री डायमेंशनल नेविगेशन भी संभव है. इसके लिए नेटवर्क के साथ संपर्क नहीं होता क्योंकि इस सिस्टम को वाई फाई में लॉग इन करने की जरूरत नहीं होती. पोजीशन का फैसला इस्ट्रूमेंट में ही होता है. और सिर्फ स्मार्ट फोन को पता होता है कि यूजर कहां है. बाहर से कोई भी यूजर की पोजीशन नहीं जान सकता.

फ्राउनहोफर का नया नेविगेशन सॉफ्टवेयर सेटेलाइट नेविगेशन का अच्छा पूरक हो सकता है. यह इमारत के अंदर और बाद में बाहर भी लोगों की मदद कर सकता है.

मार्टिन रीबे/ओएसजे

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